लखनऊ। लखनऊ जिला न्यायालय परिसर में 21 जुलाई को हुई हिंसक घटना को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए चार अधिवक्ताओं के 24 अगस्त तक जिले के किसी भी न्यायालय परिसर में प्रवेश पर रोक लगा दी है। अदालत ने इस मामले में गंभीर टिप्पणियां करते हुए संबंधित अधिवक्ताओं की गतिविधियों की खुफिया ब्यूरो (आईबी) से गोपनीय जांच, उनकी संपत्तियों का पूरा ब्यौरा और पिछले 10 वर्षों के आयकर रिटर्न प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए हैं।
अधिवक्ताओं के आवेदन पर शुरू हुई कार्रवाई
यह कार्रवाई अधिवक्ता अभिप्सा मोहंती, कोमल अग्रवाल और आशुतोष श्रीवास्तव की ओर से दायर आवेदन के आधार पर शुरू हुई। आवेदन में 21 जुलाई को लखनऊ जिला न्यायालय परिसर में हुई हिंसक घटना का विस्तृत विवरण दिया गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में पंजीकृत करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने जताई गहरी चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जिला न्यायालय परिसर में बढ़ती अराजकता और सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि न्यायालय परिसर में वकीलों का एक ऐसा समूह सक्रिय है, जो कथित रूप से जमीनों पर अवैध कब्जे, संपत्ति विवादों में हस्तक्षेप और संगठित कदाचार जैसी गतिविधियों में शामिल है। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि ऐसे लोग अपने या अपने मुवक्किलों के पक्ष में मुकदमों को प्रभावित करने के लिए विरोधी पक्ष के वकीलों और पक्षकारों पर दबाव बनाते हैं, उन्हें धमकाते हैं और कई बार न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। अदालत ने इसे न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बताया।
पीड़ित ने कोर्ट में रो-रोकर सुनाई आपबीती
मामले में आरोप है कि दीवानी मुकदमे के वादी मो. शाकिर के साथ न्यायालय परिसर में मारपीट की गई। उन्हें कथित रूप से सेंट्रल बार एसोसिएशन कार्यालय तक घसीटा गया, कई घंटे तक वहां अवैध रूप से रोके रखा गया और मुकदमा वापस न लेने पर जान से मारने की धमकी दी गई। घटना के बाद वजीरगंज थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई। 22 जुलाई को मो. शाकिर स्वयं हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष उपस्थित हुए और पूरी घटना बताते हुए भावुक हो गए। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिवक्ता सौरभ कुमार वर्मा, हर्षित पांडेय, यश पांडेय, अभय प्रताप वर्मा और उनके साथियों ने उनके साथ मारपीट की।
CCTV और प्रशासनिक रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि
हाईकोर्ट के समक्ष लखनऊ के जिला न्यायाधीश और पुलिस आयुक्त द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों तथा सीसीटीवी फुटेज में भी हमले की पुष्टि हुई। अदालत ने चार अधिवक्ताओं को घटना का मुख्य आरोपी माना और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए।
हथियार देकर झूठे मुकदमे में फंसाने का आरोप
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि आरोपी अधिवक्ता सौरभ कुमार वर्मा के पास एक हथियार था। आरोप है कि उन्होंने अधिवक्ता अभय प्रताप वर्मा से कहा कि यह हथियार मो. शाकिर के हाथ में पकड़ाकर उन्हें झूठे आपराधिक मामले में फंसाया जाए। यह भी बताया गया कि पुलिस थाने ले जाने से पहले शाकिर को कई घंटे तक बार एसोसिएशन कार्यालय में अवैध रूप से रोके रखा गया।सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी अधिवक्ता सौरभ कुमार वर्मा के खिलाफ चोरी, विश्वासघात, जालसाजी सहित कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। वहीं हर्षित पांडेय के खिलाफ भी दंगा और मारपीट से जुड़े कई मुकदमे लंबित बताए गए।
हाईकोर्ट के प्रमुख निर्देश
हाईकोर्ट ने मामले में कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं—
चारों अधिवक्ताओं के 24 अगस्त तक लखनऊ जिले के किसी भी न्यायालय परिसर में प्रवेश पर रोक।
चारों अधिवक्ताओं को हलफनामा दाखिल कर पिछले 10 वर्षों के आयकर रिटर्न, परिवार के सभी सदस्यों का विवरण तथा पिछले पांच वर्षों में अर्जित संपत्तियों और व्यवसाय का पूरा ब्योरा देना होगा।
जिन सभी दीवानी मामलों में वे पक्षकार हैं या अधिवक्ता के रूप में पेश हो रहे हैं, उनका पूरा विवरण अदालत में प्रस्तुत करना होगा।
आईबी (खुफिया ब्यूरो) को संयुक्त निदेशक की निगरानी में चारों अधिवक्ताओं की गतिविधियों की गोपनीय जांच कर सीलबंद रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का निर्देश।
जिला न्यायाधीश, लखनऊ को दो संबंधित दीवानी मामलों की फाइलें सील कर वरिष्ठ रजिस्ट्रार की अभिरक्षा में रखने का आदेश।
आजमगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को वादी मो. शाकिर को अगली सुनवाई तक पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश।
पुलिस को यह जांच करने का निर्देश कि क्या इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 (संगठित अपराध) लागू होती है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया, उत्तर प्रदेश बार काउंसिल, केंद्रीय गृह मंत्रालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय, पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश, आयकर विभाग और सेंट्रल बार एसोसिएशन लखनऊ को भी मामले में पक्षकार बनाया जाएगा।
24 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायालय परिसर में किसी भी प्रकार की अराजकता, दबाव या हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को निर्धारित करते हुए सभी संबंधित एजेंसियों से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। यह मामला अब केवल न्यायालय परिसर में हुई हिंसा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कथित संगठित आपराधिक गतिविधियों, संपत्ति विवादों और न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप जैसे गंभीर आरोपों की व्यापक जांच का विषय बन गया है।
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