मुरादाबाद । मुरादाबाद मंडल आयुक्त आंजनेय कुमार सिंह ने सोमवार को रामपुर की मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को बड़ी कानूनी राहत दे दी। उन्होंने इस विश्वविद्यालय के 38 भवनों के खिलाफ आरडीए की प्रस्तावित ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए हुए अगली सुनवाई तक किसी भी तरह की कार्रवाई न करने के निर्देश दिए हैं। इस आदेश के बाद अब विश्वविद्यालय पर बुलडोजर चलने की संभावना टल गयी है। जौहर ट्रस्ट ने आरडीए के आदेश को मंडलायुक्त न्यायालय में चुनौती दी थी।
अवकाश रहने से सुनवाई अब अगली तारीख पर होगी
आयुक्त के आदेश के बाद रामपुर का जिला प्रशासन अब अगले निर्देश मिलने तक विश्वविद्यालय परिसर में किसी भी प्रकार की ध्वस्तीकरण कार्रवाई नहीं करेगा। मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आगे का फैसला लिया जाएगा। इस प्रकरण की सुनवाई सोमवार को प्रस्तावित थी, लेकिन न्यायालय में शोक (कंडोलेंस) के कारण अवकाश रहने से सुनवाई अब अगली तारीख पर होगी। उल्लेखनीय है कि रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) ने मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय परिसर में निर्माण की जांच की और फिर आरडीए ने उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 27(1) के तहत 38 भवनों को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया था।
विश्वविद्यालय के 38 भवन बिना स्वीकृत मानचित्र के निर्मित
प्राधिकरण की जांच में दावा किया गया कि विश्वविद्यालय परिसर में बने 38 भवन बिना स्वीकृत मानचित्र के बनाए गए हैं। इसी आधार पर विश्वविद्यालय प्रशासन को नोटिस जारी कर 15 दिनों के भीतर इन निर्माणों को स्वयं हटाने का निर्देश दिया था। नोटिस में यह भी कहा गया था कि तय समय सीमा के भीतर निर्माण न गिराए जाने की स्थिति में प्रशासन अपने स्तर पर ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू करेगा। लेकिन साेमवार काे दिए गए इस आदेश से विश्वविद्यालय प्रशासन काे राहत मिल गयी है।
हाईकोर्ट ने मौलाना अली जौहर ट्रस्ट की ओर से दाखिल बाहरी व्यक्ति की याचिका पर हस्तक्षेप से किया इन्कार
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सोमवार को मौलाना अली जौहर ट्रस्ट व अन्य की याचिका पर हस्तक्षेप करने से इन्कार करते हुए निस्तारित कर दी है। कोर्ट ने कहा किसी बाहरी व्यक्ति को ट्रस्ट की तरफ से याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने पारित किया।
मोहम्मद यूसुफ , जो पेशे से व्यवसायी हैं और उन्हें मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के पैरोकार के तौर पर नियुक्त किया गया था, उसने याचिका दायर की थी। याचिका में विश्वविद्यालय/ट्रस्ट के खिलाफ जारी किसी नोटिस को चुनौती दी गई थी।
प्रदेश के अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने आपत्ति की कि विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व हमेशा उसके रजिस्ट्रार या संबंधित अधिकारी के जरिए ही होना चाहिए, और कोई “अजनबी” विश्वविद्यालय की ओर से याचिका दाखिल नहीं कर सकता। कोर्ट ने इस आपत्ति में दम पाया और कहा कि इस आधार पर याचिका खारिज भी की जा सकती थी।
बावजूद इसके, अदालत ने न्याय हित को ध्यान में रखते हुए एक व्यावहारिक रास्ता निकाला। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ट्रस्ट/यूनिवर्सिटी के खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए यह जरूरी है कि संबंधित विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार या ट्रस्ट के मैनेजर यदि नोटिस पर आपत्ति दाखिल करते हैं जिसमें क्षेत्राधिकार का मुद्दा भी शामिल है ,पर नियमानुसार विचार किया जाय।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सभी संबंधित पक्षों को सुनने के बाद राज्य प्राधिकारी सबसे पहले क्षेत्राधिकार के मुद्दे पर शीघ्रता से विचार करेगा।याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एन. सिंह सहयोगी विनीत कुमार सिंह पेश हुए।
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