लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली बिलों पर 10 प्रतिशत ईंधन अधिभार लगाने के पावर कॉर्पोरेशन के फैसले को बड़ा झटका लगा है। उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने इस अतिरिक्त वसूली पर गंभीर सवाल उठाते हुए पावर कॉर्पोरेशन को नोटिस जारी किया है और सात दिन के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। आयोग की प्रारंभिक टिप्पणी से संकेत मिले हैं कि उपभोक्ताओं से प्रस्तावित 10 प्रतिशत अतिरिक्त राशि की वसूली पर रोक लग सकती है।
इससे लाखों उपभोक्ताओं पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता
मामला तब सामने आया जब राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने आयोग में शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया कि पावर कॉर्पोरेशन ने मार्च 2026 के लिए ईंधन अधिभार की गणना करते समय केवल उस माह की बिजली खरीद लागत ही नहीं, बल्कि करीब 1400 करोड़ रुपये की पुरानी देनदारियों और बकाया दावों को भी जोड़ दिया। परिषद का कहना था कि यह प्रक्रिया नियामक नियमों के विपरीत है और इससे लाखों उपभोक्ताओं पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता।
किन आधारों पर पुरानी देनदारियों को वर्तमान गणना में शामिल किया
सुनवाई के दौरान आयोग ने भी इस पर आपत्ति जताई। आयोग ने स्पष्ट कहा कि पिछली अवधि की देनदारियों और बकाया दावों को वर्तमान ईंधन अधिभार की गणना में शामिल नहीं किया जा सकता। ऐसा करना निर्धारित विनियमों के अनुरूप नहीं है और इससे उपभोक्ताओं के हित प्रभावित होते हैं।आयोग ने पावर कॉर्पोरेशन से बिजली खरीद लागत, ट्रांसमिशन शुल्क और अधिभार की गणना से संबंधित सभी दस्तावेज और विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने को कहा है। साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि किन आधारों पर पुरानी देनदारियों को वर्तमान गणना में शामिल किया गया।
करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने आयोग के रुख का स्वागत करते हुए कहा कि यह फैसला प्रदेश के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने दावा किया कि यदि आयोग अंतिम सुनवाई में भी यही रुख अपनाता है तो उपभोक्ताओं को बिजली बिल में लगने वाले अतिरिक्त 10 प्रतिशत भार से राहत मिल सकती है।अब सभी की निगाहें पावर कॉर्पोरेशन के जवाब और आयोग के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं। आने वाला फैसला तय करेगा कि प्रदेश के उपभोक्ताओं को बढ़े हुए बिजली बिल का सामना करना पड़ेगा या फिर उन्हें बड़ी राहत मिलेगी।
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