लखनऊविद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन द्वारा लागू की गई विद्युत वितरण की वर्टिकल व्यवस्था को पूरी तरह विफल करार दिया है। समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि निजीकरण के उद्देश्य से कुछ शहरों में लागू की गई यह व्यवस्था अब बिजली व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है।

बड़ी संख्या में संविदा कर्मियों को हटा दिया गया

संघर्ष समिति ने कहा कि पहले से सुचारु रूप से चल रही विद्युत वितरण व्यवस्था को निजीकरण की दिशा में बदलने के लिए वर्टिकल व्यवस्था लागू की गई, जिसके तहत बड़े पैमाने पर नियमित पद समाप्त किए गए और बड़ी संख्या में संविदा कर्मियों को हटा दिया गया। इससे बिजली व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और कर्मचारियों पर कार्यभार भी कई गुना बढ़ गया है।

अब उसे 8 से 10 सबस्टेशन की जिम्मेदारी दी जा रही

समिति के अनुसार नई व्यवस्था में 11 केवी और 33 केवी लाइनों व सबस्टेशनों के मेंटेनेंस का कार्य अलग कर दिया गया है, जबकि राजस्व वसूली और कमर्शियल कार्य अलग तथा मीटरिंग का कार्य अलग कर दिया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि जहां पहले एक सहायक अभियंता 3 से 4 सबस्टेशन संभालता था, वहीं अब उसे 8 से 10 सबस्टेशन की जिम्मेदारी दी जा रही है। इसी प्रकार जूनियर इंजीनियरों पर भी कार्यभार काफी बढ़ गया है।संघर्ष समिति ने बताया कि कमर्शियल और तकनीकी कार्यों को अलग करने के कारण राजस्व वसूली भी प्रभावित हो रही है।

जूनियर इंजीनियरों को राजस्व वसूली के काम में लगा दिया गया

मेरठ में मार्च माह के दौरान 11 केवी और 33 केवी लाइनों के मेंटेनेंस कार्य में लगे सहायक अभियंताओं और जूनियर इंजीनियरों को राजस्व वसूली के काम में लगा दिया गया है, जो बेहद चिंताजनक है।समिति ने चेतावनी दी कि गर्मियों का मौसम शुरू होने वाला है और इस समय 33 केवी सबस्टेशनों, ट्रांसफार्मरों और लाइनों का व्यापक मेंटेनेंस बेहद जरूरी होता है। यदि तकनीकी कार्य देख रहे अभियंताओं और कर्मचारियों को राजस्व वसूली में लगा दिया जाएगा तो मेंटेनेंस कार्य प्रभावित होगा और गर्मियों में बिजली आपूर्ति गंभीर रूप से बाधित हो सकती है।संघर्ष समिति ने कहा कि बड़े पैमाने पर संविदा कर्मियों को हटाने से पहले ही बिजली व्यवस्था प्रभावित हो चुकी है।

बिजली कर्मचारियों ने अवकाश के दिन जनसंपर्क अभियान चलाया

पहले जहां एक ही सहायक अभियंता राजस्व और मेंटेनेंस दोनों कार्यों को प्रभावी ढंग से संभाल रहा था, वहां इस व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता ही नहीं थी। अब तकनीकी कर्मचारियों को भी राजस्व सूची में लगाने का फैसला प्रबंधन की असफल नीति को दर्शाता है। इस बीच संघर्ष समिति के आह्वान पर पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन के 472 दिन पूरे होने पर बिजली कर्मचारियों ने अवकाश के दिन जनसंपर्क अभियान चलाया। इस दौरान कर्मचारियों ने लोगों को बताया कि बिजली क्षेत्र के निजीकरण से उपभोक्ताओं और बिजली व्यवस्था दोनों को नुकसान हो सकता है।

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