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चीनी राष्ट्रपति सात साल बाद आ रहे भारत, शी जिनपिंग का दिल्ली दौरा कितना अहम?

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12-13 सितंबर को दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होंगे चीनी राष्ट्रपति, मोदी-शी मुलाकात को लेकर बढ़ी उम्मीदें

नई दिल्ली । नई दिल्ली के भारत मंडपम में 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की रौनक दिखने वाली है। जिसमें शामिल होने के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिल्ली पहुंच चुके हैं। पुतिन ने काफी पहले ही दिल्ली दौरे का ऐलान कर दिया था। हालांकि, चीन ने शी जिनपिंग के दौरे को लेकर ऐन वक्त तक सस्पेंस बनाए रखा। आखिरी करीब 48 घंटे पहले गुरुवार को चीन ने आधिकारिक रूप से घोषणा की है कि राष्ट्रपति शी चिनफिंग 12-13 सितंबर को दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आएंगे।

7 साल बाद भारत दौरा

शी जिनपिंग का ये भारत दौरा कई वजहों से बेहद खास माना जा रहा है। इससे पहले साल 2019 में शी जिनपिंग चेन्नई के पास मामल्लापुरम में हुई एक अनौपचारिक शिखर वार्ता के लिए भारत आए थे। साल 2019 दौरे के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में काफी उतार-चढ़ाव आए हैं। ऐसे में पूरे 7 साल बाद उनका भारत आना अपने आप में एक बड़ी बात है। भले ही यह मुख्य रूप से ब्रिक्स की एक बड़ी बैठक है, लेकिन पूरी दुनिया की नजरें नई दिल्ली में होने वाली हर हलचल पर टिकी हैं।

गलवान तनाव के बाद भारत-चीन के रिश्तों में गिरावट

2020 के गलवान घाटी तनाव के बाद भारत और चीन के रिश्तों में काफी गिरावट आई थी। साल 2020 में भारत चीन सीमा के पास गलवान में हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते और खराब हो गए थे। सीमा पर तनाव के साथ दोनों देशों के बीच राजनीतिक और आर्थिक रिश्ते भी प्रभावित हुए।

हालांकि, हाल के सालों में संबंधों में सुधार हुआ है, ख़ासकर पिछले साल चीन के तियानजिन में एससीओ बैठक में शामिल होने के लिए मोदी ने यात्रा की थी। यहां रूस और चीन के नेताओं के साथ उनकी मुलाकात ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं। पीएम मोदी और राष्ट्रपित शी के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी हुई थी।

कड़वाहट के बाद दोनों देशों के रिश्तों ने ली करवट

हालांकि, दोनों देशों के संबंधों ने एक करवट जरूर ली है। जबसे सीमा पर तनाव को कम करने की कोशिशें हुई हैं, आर्थिक रिश्तों में भी बदलाव नजर आया है। इसी साल मार्च में भारत ने चीनी निवेश पर लगाई गई कुछ पाबंदियों में ढील दी थी। ये पाबंदियां गलवान में हुई झड़पों के बाद लगाई गई थीं। इन पाबंदियों में इलेक्ट्रॉनिक्स, कैपिटल गुड्स और सोलर सेल सेक्टर आदि शामिल था।

भारत कुछ उद्योगों में भारतीय और चीनी कंपनियों के बीच ज्वाइंट वेंचर्स को तेज़ी से मंज़ूरी देने पर भी विचार कर रहा है। हाल ही में नई दिल्ली ने कुछ अहम परियोजनाओं को मंज़ूरी भी दी है जिनमें भारत की डिक्सन टेक्नोलॉजीज और चीनी स्मार्टफ़ोन निर्माता वीवो मोबाइल के बीच स्मार्टफ़ोन निर्माण से जुड़ा संयुक्त उपक्रम भी शामिल है। लेकिन अभी भी कुछ बड़े निवेश और परियोजनाओं में बाधाएं बनी हुई हैं।

तनाव कम करने की कोशिश के बाद कई मुद्दे बरकरार

तनाव कम करने की कोशिश के बाद भी दोनों देशों के बीच ट्रस्ट डेफ़िसिट (भरोसे की कमी) और ट्रेड डेफ़िसिट (व्यापार घाटा) दो अहम मुद्दे बने हुए हैं। रॉयटर्स ने पिछले सप्ताह बताया था कि नई दिल्ली ने चीन के एंट ग्रुप से जुड़ी कंपनी अलीपे के एक प्रस्ताव को मंज़ूरी देने से मना कर दिया। इस प्रस्ताव के तहत उसे भारत की तत्काल भुगतान प्रणाली से जोड़ा जाना था। भारत ने इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं का हवाला दिया था।

रॉयटर्स की रिपोर्ट की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार चीन की मोबाइल फ़ोन निर्माता कंपनी शाओमी के खिलाफ जांच की सिफारिश पर भी विचार कर रही है, जिसे सीरियस फ़्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफ़िस ने की थी। इसमें भारत में कंपनी के कारोबार में कथित अनियमितताओं और विदेशी निवेश कानूनों के उल्लंघन की जांच की बात कही गई है। हालांकि शाओमी ने कानूनों के पालन की बात कही है।

दोनों देशों में भरोसे की कमी

उधर चीन की ओर से भी बहुत सारी पाबंदियां लगाई गई हैं। रॉयटर्स ने भारतीय सूत्रों के हवाले से दावा किया कि चीनी अधिकारियों ने अपनी कंपनियों से कहा है कि वे भारत को पोर्ट इक्विपमेंट, सोलर पैनल और मोबाइल निर्माण उपकरण समेत महत्वपूर्ण तकनीक और बुनियादी ढांचे से जुड़े सामान न बेचें।

समाचार एजेंसी ने ये भी दावा किया कि सोलर एनर्जी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अहम सेक्टर में जिन उपकरणों और पुर्ज़ों की जरूरत है, उन्हें चीनी सीमा शुल्क विभाग में रोक रखा है। रॉयटर्स ने एक सरकारी अधिकारी के हवाले से ये भी दावा किया है कि कुछ बड़ी सुरंग खोदने वाली मशीनों को एक साल से अधिक समय से चीन ने रोक रखा है।

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