जिला अदालत के फैसले के बाद छह बुलडोजरों से ध्वस्तीकरण
सहारनपुर। सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद के बीच शनिवार को प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की। भारी पुलिस बल की मौजूदगी में छह बुलडोजर लगाए गए और मस्जिद के निर्माण को हटाया गया। प्रशासन ने यह कार्रवाई जिला अदालत की ओर से सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद पक्ष की अपील खारिज किए जाने के बाद की है। कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट और आसपास के इलाके में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए।
प्रशासन के मुताबिक, कलेक्ट्रेट परिसर की जमीन सरकारी है और मस्जिद का निर्माण वहां अवैध रूप से किया गया था। सहारनपुर मंडल के डीआईजी अभिषेक सिंह ने बताया कि इस मामले में सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत की ओर से पहले आदेश जारी किया गया था। मस्जिद कमेटी ने आदेश के खिलाफ पहली अपील की, जिसे जिला अदालत ने खारिज कर दिया। इसके बाद प्रशासन ने न्यायालय के आदेश के अनुपालन में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की।
डीआईजी ने कहा कि प्रशासन की ओर से कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की गई हैं। नोटिस, सुनवाई और अपील की प्रक्रिया के बाद ही कार्रवाई की गई। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पीएसी और आरआरएफ बल भी तैनात किया गया।
हाईकोर्ट जाने की तैयारी के बीच कार्रवाई का आरोप
मस्जिद पक्ष और विपक्षी नेताओं ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। सपा एमएलसी शाहनवाज खान ने दावा किया कि मस्जिद पक्ष उच्च न्यायालय में आदेश को चुनौती देने की तैयारी कर रहा था। उन्होंने कहा कि पहले सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत से आदेश आया था और उसके बाद मामले को जिला अदालत में चुनौती दी गई थी। उनका आरोप है कि आगे कानूनी राहत के लिए समय रहते ही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू कर दी गई।
शाहनवाज खान ने बताया कि कलेक्ट्रेट पहुंचने पर दोनों प्रवेश द्वार बंद मिले। बाद में उन्होंने जिलाधिकारी से मुलाकात कर अपनी आपत्तियां और आशंकाएं सामने रखीं। उन्होंने शहर में शांति और आपसी सौहार्द बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि पूरा मामला कानून के दायरे में ही सुलझाया जाना चाहिए।
पूर्व सांसद हाजी फजलुर्रहमान ने भी प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि मस्जिद पक्ष जिला अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहा था और उससे पहले ही ध्वस्तीकरण शुरू कर दिया गया।

इमरान मसूद ने उठाए जमीन के रिकॉर्ड पर सवाल
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी मस्जिद गिराए जाने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि मामला सिर्फ मस्जिद का नहीं, बल्कि कानून और संविधान से जुड़ा है। मसूद ने जमीन के स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि खसरा रिकॉर्ड में जमीन अभी भी वहीद खान और याकूब खान के नाम दर्ज है।
उन्होंने यह भी कहा कि मस्जिद वक्फ बोर्ड के साथ पंजीकृत है और लगातार वहां नमाज अदा की जाती रही है। उनके मुताबिक, वक्फ बाय यूजर के प्रावधान के तहत लंबे समय से धार्मिक उपयोग में रही संपत्ति के संबंध में भी कानूनी पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए था।
इकरा हसन को सहारनपुर जाने से रोका गया
ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के विरोध में सहारनपुर जाने की तैयारी कर रहीं कैराना से सपा सांसद इकरा हसन को पुलिस ने उनके आवास पर ही रोक दिया। पुलिस और सांसद के बीच बातचीत का वीडियो भी सामने आया, जिसमें इकरा हसन ने यात्रा रोकने का कारण पूछा।

सांसद ने कहा कि वह सहारनपुर जाकर अधिकारियों से मुलाकात कर मामले को समझना चाहती थीं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को जनता से जुड़े मुद्दे पर अधिकारियों से मिलने से भी रोका जा सकता है। इकरा हसन ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा विषय बताते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों को जनता की आवाज उठाने का अधिकार है।
इस दौरान उनकी मां और पूर्व सांसद तबस्सुम हसन भी मौजूद रहीं। उन्होंने पुलिस की कार्रवाई पर आपत्ति जताई और कहा कि उनका परिवार जनता की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है।
शिकायत के बाद शुरू हुआ था पूरा विवाद
कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को लेकर विवाद की शुरुआत फरवरी 2025 में हुई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 10 फरवरी 2025 को बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी ने जिलाधिकारी से शिकायत कर मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण बताते हुए कार्रवाई की मांग की थी। शिकायत में मस्जिद परिसर में बने कमरों और डाकघर से किराया वसूले जाने के आरोप भी लगाए गए थे।
जिलाधिकारी के निर्देश पर मामले की जांच कराई गई। प्रशासन का दावा है कि जांच में संबंधित निर्माण सरकारी जमीन पर पाया गया। इसके बाद 24 मार्च 2025 को नगर मजिस्ट्रेट की अदालत में कार्रवाई के लिए याचिका दाखिल की गई।
नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने 16 जुलाई 2026 को मस्जिद को अवैध निर्माण मानते हुए उसे हटाने का आदेश दिया। साथ ही कब्जेदारों से करीब 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति वसूलने का निर्देश दिया गया और 30 दिन का समय दिया गया।
मस्जिद पक्ष ने इस आदेश के खिलाफ 20 जुलाई को जिला अदालत में अपील दाखिल की। मामले की सुनवाई के बाद 2 सितंबर को जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।

कार्रवाई से पहले फैली थी अफवाह
ध्वस्तीकरण से पहले शुक्रवार रात यह अफवाह भी फैली कि प्रशासन मस्जिद को गिराने के लिए कलेक्ट्रेट पहुंचने वाला है। इसके बाद बड़ी संख्या में लोग मौके पर जुटने लगे। सूचना मिलने पर पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची और लोगों को वहां से हटाया।
शनिवार को कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास के क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात रहा। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि कार्रवाई न्यायालय के आदेश के अनुपालन और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई है। वहीं, विपक्षी नेताओं और मस्जिद पक्ष की ओर से कार्रवाई के समय और कानूनी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
फिलहाल प्रशासन की कार्रवाई के बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा में है। क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस, पीएसी और आरआरएफ की तैनाती जारी रखी गई है।
यह भी पढ़े : सपा का बड़ा महिला कार्ड, सत्ता में आई तो हर महिला को सालाना ₹40 हजार: अखिलेश
यह भी पढ़े : यूपी में 60+ महिलाओं को रोडवेज में मुफ्त सफर, सीएम योगी ने सपा पर साधा निशाना
यह भी पढ़े : यूपी में इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड में बड़ा इजाफा, अब हर महीने मिलेंगे 25 हजार रुपये
यह भी पढ़े : यूपी कैबिनेट का बड़ा फैसला: 60 साल से अधिक उम्र की महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा









