उत्तर प्रदेश में महाराष्ट्र से अधिक उपभोक्ता, लेकिन नियमित कर्मचारी एक-तिहाई से भी कम
लखनऊ । विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन से मांग की है कि प्रदेश में पिछले नौ वर्षों में उपभोक्ताओं की संख्या में हुई अभूतपूर्व वृद्धि को देखते हुए सभी संवर्गों की तत्काल कैडर रिस्ट्रक्चरिंग की जाए तथा उपभोक्ता संख्या के अनुरूप सभी पदों में समुचित वृद्धि की जाए। संघर्ष समिति ने कहा कि वर्तमान मानव संसाधन संरचना बढ़ते कार्यभार के अनुरूप नहीं है, जिससे बिजली व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
संघर्ष समिति ने महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में महाराष्ट्र की तुलना में कहीं अधिक उपभोक्ता हैं, लेकिन नियमित कर्मचारियों की संख्या महाराष्ट्र की तुलना में एक-तिहाई से भी कम है। यह स्थिति प्रदेश की बिजली व्यवस्था तथा उपभोक्ता सेवाओं के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
संघर्ष समिति ने बताया कि वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद के विघटन के समय प्रदेश में लगभग 60 लाख उपभोक्ता तथा लगभग 1.20 लाख कर्मचारी थे। आज उत्तर प्रदेश में उपभोक्ताओं की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 73 लाख से अधिक हो गई है, जबकि नियमित कर्मचारियों की संख्या घटकर 30 हजार से भी कम रह गई है। इसके अतिरिक्त निजीकरण की नीति के तहत लगभग 25 हजार संविदा कर्मचारियों को भी सेवा से हटाया जा चुका है, जिससे स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है।
संघर्ष समिति ने कहा कि महाराष्ट्र में लगभग 2 करोड़ 89 लाख उपभोक्ता हैं, जो उत्तर प्रदेश से काफी कम हैं, लेकिन वहां लगभग 93 हजार नियमित कर्मचारी कार्यरत हैं। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में उपभोक्ता कहीं अधिक होने के बावजूद नियमित कर्मचारियों की संख्या महाराष्ट्र की तुलना में एक-तिहाई से भी कम है। यह असंतुलन बिजली व्यवस्था की गुणवत्ता, उपभोक्ता सेवाओं तथा कर्मचारियों पर बढ़ते कार्यभार को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
संघर्ष समिति ने मांग की कि सभी संवर्गों की तत्काल कैडर रिस्ट्रक्चरिंग कर उपभोक्ता संख्या के अनुरूप नए पद सृजित किए जाएं। साथ ही सभी संवर्गों में पदोन्नति के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाएं ताकि कर्मचारी वर्षों तक एक ही पद पर कार्य करने को विवश न रहें और उनमें निराशा एवं कुंठा की भावना उत्पन्न न हो।
संघर्ष समिति ने कहा कि पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन प्रदेश में सर्वाधिक बिजली आपूर्ति तथा सर्वाधिक उपभोक्ताओं का दावा करते हुए उत्तर प्रदेश को देश का अग्रणी राज्य बताता है, किंतु मानव संसाधन के मामले में उत्तर प्रदेश का बिजली क्षेत्र देश के कई छोटे राज्यों से भी पीछे चला गया है। यह अत्यंत गंभीर और चिंताजनक स्थिति है।
संघर्ष समिति ने कहा कि किसी भी बिजली व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए मैन, मैटेरियल और मशीन तीनों आवश्यक हैं, किंतु इनमें सबसे महत्वपूर्ण मानव संसाधन है। पर्याप्त मानव संसाधन के अभाव में न तो उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण सेवाएं दी जा सकती हैं और न ही कर्मचारियों से अपेक्षित कार्यक्षमता प्राप्त की जा सकती है। इसलिए मानव संसाधन को सुदृढ़ करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
संघर्ष समिति ने कहा कि जब पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन गर्व के साथ यह कहता है कि उत्तर प्रदेश में देश के सबसे अधिक बिजली उपभोक्ता हैं और सबसे अधिक बिजली आपूर्ति की जा रही है, तब उसे यह लक्ष्य भी निर्धारित करना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में देश का सबसे मजबूत और पर्याप्त मानव संसाधन भी हो। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश में देश के सबसे अधिक बिजली कर्मचारी थे। आज भी प्रदेश की आवश्यकताओं के अनुरूप उसी स्तर की मानव संसाधन नीति अपनाने की आवश्यकता है।
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