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कोचिंग अग्निकांड : “मेरा बेटा अपाहिज भी हो जाता तो उसे सीने से लगाकर रखती…”

—एक मां का दर्द और धुएं के बीच उम्मीद बनकर आए ‘फरिश्ते’ की कहानी

लखनऊ । राजधानी के अलीगंज में हुए भीषण कोचिंग अग्निकांड ने सिर्फ 15 जिंदगियां नहीं छीनीं, बल्कि कई घरों की हंसी, उम्मीदें और भविष्य भी राख कर दिए। किसी मां का इकलौता सहारा चला गया, किसी बहन का भाई और किसी पिता की बुढ़ापे की लाठी। लेकिन इस दर्दनाक त्रासदी के बीच दो तस्वीरें ऐसी हैं, जो हमेशा याद रखी जाएंगी—एक अपने जवान बेटे को खो चुकी मां की और दूसरी अपनी जान जोखिम में डालकर अनजान बच्चों को बचाने वाले एक बहादुर अफसर की।

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अलीगंज अग्निकांड में जान गंवाने वाले आदित्य की मां कल्पना श्रीवास्तव के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। बेटे की तस्वीर को सीने से लगाकर बैठी मां के सामने जब मुआवजे और सरकारी सहायता की बात होती है, तो उनका दर्द गुस्से में बदल जाता है।

हमें क्या पता था कि यह उसकी आखिरी विदाई होगी

वह कहती हैं, “मेरा भैया बहुत अच्छा था। किसी का बुरा नहीं सोचता था। हमेशा सच बोलता था। उसने जिंदगी में कभी किसी को तकलीफ नहीं दी। 6 मई को घर से गया था। बीच में कुछ दिन के लिए आया था, फिर पढ़ाई और अपने भविष्य के सपनों को पूरा करने वापस चला गया। हमें क्या पता था कि यह उसकी आखिरी विदाई होगी।

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” मां की आंखों के सामने अब भी वह भयावह मंजर घूम रहा है। चारों तरफ उठता काला धुआं, चीखते बच्चे और बेबस परिजन। “लोग कह रहे थे कि बच्चे बच जाएंगे, लेकिन मैं उस धुएं को देखकर समझ गई थी कि अंदर फंसे बच्चों के लिए सांस लेना भी मुश्किल होगा। मुझे तभी लग गया था कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है।”इसके बाद वह सिस्टम पर सवाल उठाती हैं।

“अगर दमकल समय पर पहुंचती, अगर बचाव की तैयारी होती, अगर सुरक्षा के इंतजाम होते तो आज मेरा बेटा जिंदा होता। वह जल जाता, घायल हो जाता, अपाहिज हो जाता, तब भी मैं उसे पाल लेती। उसे गोद में उठाकर बाथरूम तक ले जाती। सारी जिंदगी उसकी सेवा करती। लेकिन कम से कम वह हमारे साथ तो होता।

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”यह कहते-कहते उनकी आवाज भर्रा जाती है।“लोग कह रहे हैं कि मुआवजा मिलेगा। क्या कोई पैसा मेरा बेटा वापस ला सकता है? हमारा सब कुछ ले जाओ, लेकिन मेरा बच्चा लौटा दो…।”मां की यह पुकार सिर्फ आदित्य की मां की नहीं, बल्कि उन सभी परिवारों की आवाज है, जिनके घर इस हादसे में उजड़ गए।

धुएं और चीखों के बीच उतरा एक फरिश्ता

जहां एक तरफ हादसे के बाद हर ओर अफरा-तफरी थी, वहीं दूसरी तरफ एक शख्स ऐसा भी था जिसने अपने बारे में नहीं, बल्कि दूसरों की जिंदगी के बारे में सोचा। राज्यपाल के पर्सनल सिक्योरिटी अफसर समरजीत सिंह उस दिन ड्यूटी खत्म कर घर लौट रहे थे। दोपहर का समय था। रास्ते में उन्होंने देखा कि अलीगंज स्थित कोचिंग सेंटर की इमारत से धुएं का गुबार उठ रहा है और बच्चे मदद के लिए चिल्ला रहे हैं।

चारों ओर भीड़ थी। कुछ लोग वीडियो बना रहे थे, कुछ दूर खड़े तमाशा देख रहे थे। लेकिन समरजीत सिंह के लिए यह सिर्फ एक घटना नहीं थी। उन्हें अंदर फंसे बच्चों की चीखें सुनाई दे रही थीं। उन्होंने बिना एक पल गंवाए खुद को बचाव कार्य में झोंक दिया। इमारत से नीचे कूदने की कोशिश कर रहे छात्रों को सहारा देने के लिए उन्होंने तार और अन्य साधनों का सहारा लिया।

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कई बच्चों को गिरने से बचाया। दूसरी तरफ जब दीवार तोड़कर अंदर पहुंचने की कोशिश की जा रही थी, तो वह भी उस काम में जुट गए। धुएं से भरे उस खतरनाक माहौल में जहां हर कदम मौत के करीब ले जा सकता था, समरजीत सिंह पानी की बौछार के सहारे धीरे-धीरे अंदर तक पहुंचे।

वहां फंसे छात्रों को बाहर निकालने की कोशिश शुरू की। उनकी बहादुरी का नतीजा यह रहा कि छह छात्रों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। बाद में उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “मैंने वही किया जो उस समय मुझे सही लगा। बच्चे मदद के लिए चिल्ला रहे थे। मैं उन्हें उस हालत में छोड़कर नहीं जा सकता था। सुकून सिर्फ इस बात का है कि मेरे प्रयास से छह बच्चों की जान बच गई।”

एक हादसा, दो तस्वीरें

अलीगंज अग्निकांड की कहानी सिर्फ मौत और मातम की कहानी नहीं है। यह एक तरफ उस मां की कहानी है जो आज भी अपने बेटे के लौट आने का इंतजार कर रही है, और दूसरी तरफ उस इंसान की कहानी है जिसने अनजान बच्चों को बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी। एक तस्वीर में मां की सूनी आंखें हैं, जिनमें अब भी बेटे की यादें तैर रही हैं।

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दूसरी तस्वीर में धुएं के बीच दौड़ता एक बहादुर शख्स है, जो साबित करता है कि इंसानियत आज भी जिंदा है। लेकिन इन दोनों तस्वीरों के बीच एक सवाल अब भी खड़ा है—अगर सुरक्षा इंतजाम बेहतर होते, अगर राहत समय पर पहुंचती, तो क्या आज कई घरों के चिराग बुझने से बच सकते थे? इस सवाल का जवाब शायद जांच रिपोर्टों में मिले या न मिले, लेकिन आदित्य की मां की वह एक पंक्ति लंबे समय तक लोगों के दिलों में गूंजती रहेगी—“मेरा बेटा अपाहिज भी हो जाता तो उसे सीने से लगाकर रखती… बस वह जिंदा तो होता।”

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