दुर्गा सप्तशती के पाठ और शक्तिपीठों के दर्शन का विशेष महत्व, दशमहाविद्याओं में भी समाहित हैं आदिशक्ति के दिव्य स्वरूप
लखनऊ। शारदीय नवरात्र के चौथे दिन देशभर में मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा-अर्चना की जा रही है। मंदिरों से लेकर घरों तक भक्त मां की आराधना कर सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना कर रहे हैं। इस पावन अवसर पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान और पंकज चौधरी के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तथा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव समेत कई नेताओं ने देशवासियों को नवरात्र की शुभकामनाएं दीं। नेताओं ने मां कूष्मांडा से सभी के जीवन में आरोग्यता, सकारात्मकता और खुशहाली बनाए रखने की प्रार्थना की।
नेताओं ने मां कूष्मांडा के चरणों में किया नमन
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर मां कूष्मांडा को नमन करते हुए कहा कि नवरात्र के चौथे दिन रोग और शोक से मुक्ति दिलाने वाली मां की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। उन्होंने कामना की कि मां सभी को आयु, यश, बल और आरोग्य प्रदान करें।
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मां कूष्मांडा के चतुर्थ स्वरूप के चरणों में प्रणाम करते हुए सभी के मंगल और कल्याण की कामना की। उन्होंने प्रार्थना की कि मां अपने भक्तों को रोग, शोक से मुक्त कर सुख, समृद्धि, यश और आनंदमय जीवन का आशीर्वाद दें।
केंद्रीय मंत्री एवं उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने भी मां कूष्मांडा को नमन करते हुए कहा कि उनकी कृपा से सभी के जीवन में उत्तम स्वास्थ्य, समृद्धि और सफलता का वास हो।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मां भगवती के चतुर्थ स्वरूप के चरणों में बारंबार प्रणाम करते हुए श्रद्धालुओं के जीवन में आरोग्यता, सुख, समृद्धि, ऊर्जा और सकारात्मकता के संचार की कामना की।
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मां कूष्मांडा की आराधना को समर्पित नवरात्र के चौथे दिन उनके श्रीचरणों में प्रणाम किया और सभी के जीवन को सुख, शांति, समृद्धि तथा उत्तम स्वास्थ्य से परिपूर्ण होने की प्रार्थना की। वहीं, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मां के दिव्य स्वरूप का स्मरण करते हुए सभी के कल्याण की कामना की।
मां कूष्मांडा की पूजा का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कूष्मांडा को सृष्टि की सृजनकर्ता आदिशक्ति के स्वरूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि देवी ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी कारण उन्हें कूष्मांडा कहा जाता है। नवरात्र के चौथे दिन उनकी पूजा करने से जीवन में ऊर्जा, उत्साह, आरोग्य और सकारात्मकता का संचार होने की धार्मिक मान्यता है।
मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं होने के कारण उन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृतपूर्ण कलश, चक्र, गदा और जपमाला जैसे आयुध एवं प्रतीक बताए गए हैं। भक्त इस दिन विधि-विधान से पूजा, मंत्र जाप और आरती कर मां का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।
दुर्गा सप्तशती के पाठ से जुड़ी हैं विशेष धार्मिक मान्यताएं
नवरात्र के दौरान मां दुर्गा की आराधना के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ भी विशेष महत्व रखता है। इसे ‘देवी माहात्म्य’ और ‘चंडी पाठ’ के नाम से भी जाना जाता है। यह मार्कंडेय पुराण का एक महत्वपूर्ण भाग है। इसमें 13 अध्याय और 700 श्लोक हैं, जिनमें देवी की महिमा, असुरों के साथ उनके युद्ध और अधर्म पर धर्म की विजय का वर्णन मिलता है।
दुर्गा सप्तशती को तीन चरित्रों में विभाजित किया गया है—प्रथम चरित्र महाकाली, मध्यम चरित्र महालक्ष्मी और उत्तर चरित्र महासरस्वती से संबंधित है। इसमें मधु-कैटभ, महिषासुर, धूम्रलोचन, चंड-मुंड, रक्तबीज तथा शुंभ-निशुंभ के वध की कथाएं वर्णित हैं। ये कथाएं देवी की शक्ति, साहस और धर्म की रक्षा के प्रतीक के रूप में देखी जाती हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और एकाग्रता के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से भक्तों को मानसिक संबल मिलता है और वे भय, बाधाओं तथा कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। नवरात्र में कई श्रद्धालु नौ दिनों तक नियमित पाठ करते हैं, जबकि कुछ लोग अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार इसे एक या अधिक बैठकों में पूरा करते हैं।
दुर्गा सप्तशती के प्रमुख मंत्र
दुर्गा सप्तशती और देवी उपासना की परंपरा में कई मंत्रों का विशेष स्थान है। इनमें प्रमुख हैं—
1. सर्वमंगल मंत्र
“सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥”
यह मंत्र देवी के मंगलकारी स्वरूप को नमन करने और परिवार की सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना के लिए प्रसिद्ध है।
2. जयन्ती मंगलाकाली मंत्र
“ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते॥”
इस मंत्र में देवी के विभिन्न स्वरूपों की स्तुति की गई है। भक्त इसे मां दुर्गा की कृपा और संकटों से रक्षा की कामना के साथ जपते हैं।
3. देवी रक्षा मंत्र
“शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥”
इस मंत्र के माध्यम से देवी से सभी दिशाओं में रक्षा और संकटों से बचाने की प्रार्थना की जाती है।
4. सर्वबाधा प्रशमन मंत्र
“सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥”
यह मंत्र जीवन की बाधाओं और कष्टों को दूर करने की कामना से जुड़ा है।
दुर्गा सप्तशती के पाठ में इन बातों का रखें ध्यान
पारंपरिक धार्मिक विधि के अनुसार, पाठ से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। पूजा स्थल की सफाई कर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। दीपक जलाकर पुष्प, अक्षत और कुमकुम अर्पित किए जाते हैं। कई परंपराओं में सप्तशती के मुख्य पाठ से पहले दुर्गा कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र का पाठ करने का विधान है।
पाठ के दौरान शुद्ध उच्चारण, एकाग्रता और श्रद्धा पर जोर दिया जाता है। पुस्तक को साफ चौकी पर सम्मानपूर्वक रखना और पाठ पूरा होने के बाद आरती तथा प्रसाद वितरण करना भी प्रचलित परंपरा है। कई परिवार नवरात्र में खानपान और दैनिक आचरण से जुड़े संयम का पालन करते हैं। इन नियमों में क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है।
51 शक्तिपीठों से जुड़ी है देवी सती की कथा
नवरात्र में देवी मंदिरों के दर्शन के साथ शक्तिपीठों की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव की पत्नी सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। ये स्थल भारत सहित पड़ोसी देशों में फैले हुए हैं और सदियों से शक्ति उपासना के प्रमुख केंद्र रहे हैं।
शक्तिपीठों की संख्या और उनकी सूची अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों तथा परंपराओं में कुछ भिन्न मिलती है। लोकप्रिय मान्यता में 51 शक्तिपीठों का विशेष उल्लेख किया जाता है। इन स्थलों पर नवरात्र के दौरान विशेष पूजा, धार्मिक अनुष्ठान और मेले आयोजित होते हैं। श्रद्धालु देवी के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना करते हैं।
प्रमुख शक्तिपीठ और उनकी धार्मिक मान्यताएं
गायत्री शक्तिपीठ, पुष्कर-अजमेर: राजस्थान में पुष्कर के निकट गायत्री पहाड़ी क्षेत्र में स्थित इस धार्मिक स्थल को मणिदेविका शक्तिपीठ से भी जोड़ा जाता है। मान्यता के अनुसार, यहां सती की कलाई गिरी थी। अजमेर से पुष्कर तक सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है।
अंबिका शक्तिपीठ, विराट नगर: राजस्थान के विराट नगर क्षेत्र में स्थित इस स्थल को देवी अंबिका की उपासना से जोड़ा जाता है। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां सती के बाएं पैर का अंगूठा गिरा था। यह स्थान प्राचीन मत्स्य क्षेत्र की ऐतिहासिक परंपराओं से भी जुड़ा है।
चंद्रभागा शक्तिपीठ, प्रभास क्षेत्र: गुजरात के प्रभास क्षेत्र में स्थित इस शक्तिपीठ को देवी उपासना की प्रमुख परंपराओं में गिना जाता है। यहां देवी के अंग के गिरने से संबंधित मान्यताएं प्रचलित हैं। प्रभास क्षेत्र में सोमनाथ मंदिर भी स्थित है, जो देश के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल है।
करवीरपुर या शिवहरकर शक्तिपीठ, कोल्हापुर: महाराष्ट्र के कोल्हापुर क्षेत्र में देवी महिषासुरमर्दिनी की उपासना का विशेष महत्व है। इस क्षेत्र को करवीर के नाम से भी जाना जाता है। यहां देवी और शिव से जुड़ी पौराणिक परंपराएं श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख आधार हैं।
त्रिपुरसुंदरी शक्तिपीठ, त्रिपुरा: त्रिपुरा के उदयपुर के निकट स्थित त्रिपुरसुंदरी मंदिर को माताबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां सती का दायां पैर गिरा था। मंदिर को कूर्म पीठ भी कहा जाता है, क्योंकि जिस पहाड़ी पर यह स्थित है, उसका आकार कछुए की पीठ जैसा माना जाता है। इसका निर्माण 16वीं शताब्दी की शुरुआत में महाराजा धान्य माणिक्य के शासनकाल में कराया गया था।
शक्तिपीठ केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं हैं, बल्कि भारतीय धार्मिक परंपराओं, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण प्रतीक भी हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थित इन तीर्थों को जोड़ने वाली शक्ति उपासना की परंपरा भारत की विविधता में एकता को भी दर्शाती है।
दशमहाविद्याओं में भी देवी के दस दिव्य स्वरूप
शाक्त परंपरा में दशमहाविद्याओं का भी विशेष स्थान है। ‘महाविद्या’ का अर्थ महान ज्ञान से जुड़ा है। सामान्यतः दशमहाविद्याओं में मां काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला को शामिल किया जाता है।
धार्मिक कथाओं के एक प्रचलित वर्णन के अनुसार, जब भगवान शिव ने माता सती को दक्ष प्रजापति के यज्ञ में जाने से रोका, तब सती ने अपने दस दिव्य स्वरूप प्रकट किए। इन्हीं स्वरूपों को दशमहाविद्याओं के रूप में जाना जाता है। हालांकि, इनके वर्णन और उपासना की विधियों में अलग-अलग शाक्त परंपराओं के अनुसार अंतर मिलता है।
मां काली को समय, परिवर्तन और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मां तारा संकट से पार लगाने वाली देवी के रूप में पूजित हैं। त्रिपुरसुंदरी का श्रीविद्या परंपरा में विशेष स्थान है, जबकि भुवनेश्वरी को जगत की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है।
छिन्नमस्ता का स्वरूप त्याग और आत्मबल से जुड़े प्रतीकों के माध्यम से समझा जाता है। भैरवी शक्ति और तप की प्रतीक हैं। धूमावती का संबंध वैराग्य तथा जीवन के कठिन पक्षों से जोड़ा जाता है। बगलामुखी की उपासना वाणी और विरोधी शक्तियों को नियंत्रित करने की धार्मिक मान्यता से जुड़ी है। मातंगी का संबंध वाणी, संगीत और कला से है, जबकि कमला को समृद्धि और ऐश्वर्य से जुड़े स्वरूप में पूजा जाता है।
दशमहाविद्याओं और नवदुर्गा में अंतर भी महत्वपूर्ण है। नवदुर्गा मां दुर्गा के नौ स्वरूप हैं, जिनकी नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः पूजा की जाती है। वहीं दशमहाविद्या दस देवियों का समूह है, जिसका विशेष संबंध शाक्त और तांत्रिक धार्मिक परंपराओं से है।
आस्था, साधना और सांस्कृतिक परंपरा का पर्व है नवरात्र
शारदीय नवरात्र केवल नौ दिनों का धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय समाज में आस्था, साधना, शक्ति और सांस्कृतिक एकता का महत्वपूर्ण पर्व है। इन दिनों मंदिरों में दर्शन, घरों में पूजा-पाठ, दुर्गा सप्तशती का पाठ और शक्तिपीठों की यात्रा के माध्यम से श्रद्धालु मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण करते हैं।
नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्मांडा की आराधना के साथ देश के नेताओं की शुभकामनाओं ने भी पर्व के धार्मिक महत्व को रेखांकित किया। भक्त मां से सुख, शांति, आरोग्य और समृद्धि की कामना कर रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी की उपासना का मूल भाव श्रद्धा, सदाचार, आत्मबल और सभी के कल्याण की भावना है।
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