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रामगंगा विहार में श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन गोवर्धन पूजा का प्रसंग

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कथा व्यास गुरु कृपाचार्य जी ने कहा- पद बड़ा नहीं, भाव बड़ा होता है; प्रकृति, गौ और संस्कृति का सम्मान ही गोवर्धन पूजा का संदेश

मुरादाबाद। रामगंगा विहार के जी ब्लॉक स्थित श्री राधे श्याम पार्क में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन श्रद्धा और भक्ति का वातावरण देखने को मिला। कथा व्यास गुरु कृपाचार्य जी ने भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत केवल भगवान की लीलाओं का वर्णन नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का दर्शन भी है। कथा के दौरान उन्होंने गोवर्धन पूजा के धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश को सरल शब्दों में श्रद्धालुओं के सामने रखा।

इंद्र पूजा को लेकर श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों से पूछा सवाल

गुरु कृपाचार्य जी ने कथा सुनाते हुए बताया कि एक बार ब्रज में इंद्र यज्ञ की तैयारी चल रही थी। नंद बाबा सहित सभी ब्रजवासी इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए पूजा की तैयारियों में जुटे थे। उस समय बाल स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण ने नंद बाबा से पूछा कि आखिर इंद्र की पूजा क्यों की जाती है।

नंद बाबा ने बताया कि इंद्र देव वर्षा करते हैं। वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से सभी का जीवन चलता है। इस पर बाल कृष्ण ने प्रश्न किया कि ब्रजवासियों का जीवन केवल वर्षा पर निर्भर नहीं है। उनकी गायें गोवर्धन पर्वत पर चरती हैं और गोवर्धन उन्हें फल, फूल, औषधियां और जल प्रदान करता है। ऐसे में ब्रजवासियों का वास्तविक जीवन आधार गोवर्धन पर्वत और गौ माता हैं।भगवान श्रीकृष्ण की बातों से प्रभावित होकर ब्रजवासियों ने इंद्र यज्ञ बंद कर दिया और गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हुए अन्नकूट का आयोजन किया।

इंद्र के अहंकार ने बरसाया प्रलय

कथा व्यास ने बताया कि जब इंद्र को पता चला कि ब्रजवासियों ने उनकी पूजा बंद करके गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू कर दी है तो उन्हें क्रोध आ गया। इंद्र के भीतर अहंकार उत्पन्न हुआ और उन्होंने सांवर्तक मेघों को आदेश दिया कि वे मूसलाधार बारिश करके पूरे वृंदावन को डुबो दें।

इसके बाद ब्रज में लगातार सात दिन और सात रात तक तेज बारिश हुई। बिजली की गड़गड़ाहट, आंधी और तूफान से पूरा ब्रज संकट में पड़ गया। चारों ओर पानी भरने लगा और ब्रजवासी भयभीत हो गए। संकट की इस घड़ी में सभी ब्रजवासी भगवान श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचे और उन्हें पुकारते हुए कहने लगे- कन्हैया बचाओ।

कनिष्ठा उंगली पर उठा लिया गोवर्धन

गुरु कृपाचार्य जी ने भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का भावपूर्ण वर्णन करते हुए कहा कि अपने भक्तों को संकट में देखकर भगवान श्रीकृष्ण से रहा नहीं गया। वे गोवर्धन पर्वत के पास पहुंचे और अपनी एक हाथ की कनिष्ठा उंगली पर पूरे गोवर्धन पर्वत को छतरी की तरह उठा लिया।

उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण सात दिन तक बिना कुछ खाए-पिए और बिना हिले-डुले गोवर्धन पर्वत को धारण किए खड़े रहे। पर्वत के नीचे सभी ब्रजवासी, गाय और बछड़े सुरक्षित हो गए। भगवान के सानिध्य में सभी भयमुक्त और आनंदित रहे।

सात दिन तक लगातार वर्षा करने के बाद इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। उनका अहंकार समाप्त हुआ और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की महिमा को स्वीकार किया।

पद से बड़ा होता है भाव

कथा व्यास गुरु कृपाचार्य जी ने गोवर्धन लीला का आध्यात्मिक संदेश बताते हुए कहा कि इंद्र को अपने पद का अहंकार था और भगवान श्रीकृष्ण ने उनके अहंकार को तोड़ा। कथा हमें सिखाती है कि जीवन में पद बड़ा नहीं होता, बल्कि भाव बड़ा होता है।

उन्होंने कहा कि आज भी इंद्र हमारे भीतर मौजूद है। हमारा अहंकार, लोभ और यह भावना कि ‘मैं बड़ा हूं’, उसी इंद्र का स्वरूप है। इसके विपरीत गोवर्धन हमारे बुजुर्गों, हमारी संस्कृति और हमारी प्रकृति का प्रतीक है।

प्रकृति की रक्षा का संदेश

गुरु कृपाचार्य जी ने कहा कि गोवर्धन पूजा का संदेश आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रकृति ही परमात्मा का स्वरूप है। जो हमें धारण करता है, वही गोवर्धन है। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य प्रकृति का लगातार दोहन कर रहा है। पहाड़, नदियां, पेड़ और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना हमारे भीतर के अहंकार का ही परिणाम है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से प्रकृति की रक्षा करने का आह्वान करते हुए कहा कि गोवर्धन पूजा हमें पहाड़, नदी, पेड़ और गौवंश के संरक्षण का संदेश देती है। प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना ही इस पर्व की वास्तविक भावना है।

56 भोग से जुड़ा है अन्नकूट पर्व

कथा व्यास ने बताया कि गोवर्धन पूजा के अवसर पर भगवान को 56 प्रकार के भोग लगाए जाते हैं। इसी कारण इसे अन्नकूट पर्व भी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि अन्नकूट का भाव केवल भगवान को तरह-तरह के व्यंजन अर्पित करना नहीं, बल्कि अपने पास उपलब्ध चीजों को समाज के साथ बांटकर खाने की भावना भी है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को सेवा, सहयोग और परस्पर प्रेम का संदेश देते हुए कहा कि जो कुछ हमारे पास है, उसे केवल अपने तक सीमित रखने के बजाय जरूरतमंदों और समाज के साथ साझा करना चाहिए।

गौ सेवा के बिना गोवर्धन पूजा अधूरी

गुरु कृपाचार्य जी ने कहा कि गोवर्धन पूजा गौ पूजा के बिना अधूरी है। उन्होंने गौ माता की सेवा और संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जिस घर में गौ सेवा होती है, वहां लक्ष्मी का स्थायी निवास माना जाता है।उन्होंने श्रद्धालुओं से गौ सेवा के साथ-साथ प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील रहने की अपील की।

बुजुर्गों और संस्कृति के सम्मान का संदेश

कथा का सार बताते हुए गुरु कृपाचार्य जी ने कहा कि आज के समय में गोवर्धन का अर्थ केवल एक पर्वत नहीं है। हमारे परिवार के बुजुर्ग, हमारी संस्कृति और हमारी प्रकृति भी गोवर्धन के समान हैं। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी उंगली पर धारण करके ब्रजवासियों की रक्षा की, उसी प्रकार यदि मनुष्य अपने जीवन में बड़ों का सम्मान, प्रकृति का संरक्षण और संस्कृति का पालन करेगा तो ईश्वर की कृपा उसके साथ बनी रहेगी।उन्होंने कहा कि जब तक हम गोवर्धन रूपी बड़ों और प्रकृति का सम्मान करते रहेंगे, तब तक श्रीकृष्ण रूपी ईश्वर हमारी रक्षा के लिए अपनी उंगली पर हमें धारण किए रहेंगे।

बड़ी संख्या में श्रद्धालु रहे मौजूद

कथा के पांचवें दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्री राधे श्याम पार्क पहुंचे। कथा के दौरान भक्ति और श्रद्धा का वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन महाराज की कथा का श्रवण किया।

आयोजन में स्वाती, अंजू रस्तोगी, कुसुम, प्रेम वाला, वाणी, सीमा, अनीता, रूबी, अर्चना, शोभा सिंह, प्रीति, गुंजन, मेघा, अमित अग्रवाल, दलबीर सिंह, पराग, मंजू अग्रवाल, इंदु मेहता, पारुल सहित अन्य सहयोगी मौजूद रहे। आयोजकों के अनुसार कथा में सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का श्रवण किया और भक्ति भाव में डूबे रहे। पूरे आयोजन में धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण, गौ सेवा, समाज के साथ मिलकर रहने और अहंकार त्यागने का संदेश प्रमुख रूप से सामने आया।

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