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रामपुर में 2027 की सियासी जंग दिलचस्प, कहीं सपा का गढ़ तो कहीं भाजपा का दबदबा

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आजम खान के गढ़ रामपुर सदर और स्वार में उपचुनाव के बाद बदले समीकरण, चमरौआ में सपा तो बिलासपुर और मिलक में भाजपा को मिली थी जीत

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछने लगी है। राजनीतिक दल अपनी रणनीति तैयार करने में जुटे हैं और चुनावी चर्चाओं के बीच रामपुर जिले की पांच विधानसभा सीटें भी खासा महत्व रखती हैं। कभी समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान और उनके परिवार का मजबूत प्रभाव रहा, तो उपचुनावों के बाद भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने भी यहां अपनी पकड़ बनाई। अब सवाल है कि 2027 में रामपुर का सियासी समीकरण किस करवट बैठेगा?

रामपुर जिले में रामपुर सदर, स्वार, चमरौआ, बिलासपुर और मिलक (सुरक्षित) विधानसभा सीटें हैं। पिछले चुनावों के नतीजे बताते हैं कि यहां मुकाबला केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीतिक प्रभाव, प्रत्याशियों की पकड़ और विभिन्न सामाजिक वर्गों के समर्थन के इर्द-गिर्द भी घूमता है।

रामपुर सदर: आजम खान के गढ़ में भाजपा की सेंध

रामपुर सदर सीट लंबे समय तक समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान का मजबूत राजनीतिक गढ़ रही। आजम खान यहां से 10 बार विधायक चुने गए। 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के आकाश सक्सेना को बड़े अंतर से हराया था। आजम खान को 1,31,225 वोट मिले, जबकि आकाश सक्सेना को 76,084 वोट हासिल हुए। जीत का अंतर 55,141 मतों का था।

हालांकि, कानूनी मामले में सजा के बाद आजम खान की विधानसभा सदस्यता रद्द हो गई और सीट पर उपचुनाव हुआ। इस बार भाजपा ने बाजी पलट दी। आकाश सक्सेना ने सपा के मोहम्मद असीम राजा को 34,136 वोटों से हराकर सीट भाजपा के खाते में डाल दी। आकाश सक्सेना को 81,432 और असीम राजा को 47,296 वोट मिले।

रामपुर सदर को मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी हिस्सेदारी वाली सीट माना जाता है। इसके साथ ही वैश्य, पंजाबी, ब्राह्मण, दलित और ओबीसी मतदाताओं का समर्थन भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में 2027 में भाजपा के सामने अपनी जीत बरकरार रखने, जबकि सपा के सामने इस सीट पर दोबारा कब्जा जमाने की चुनौती होगी।

स्वार: आजम परिवार के प्रभाव के बाद बदला चुनावी गणित

स्वार विधानसभा सीट भी रामपुर की चर्चित सीटों में शामिल है। यहां से आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम ने 2017 और 2022 में लगातार जीत दर्ज की थी। बाद में सजा के चलते उनकी सदस्यता रद्द हो गई और 2023 में उपचुनाव कराया गया।

उपचुनाव में अपना दल (सोनेलाल) के शफीक अहमद अंसारी ने सपा की अनुराधा चौहान को 8,724 वोटों से हराया। शफीक अहमद अंसारी को 68,630 वोट मिले, जबकि अनुराधा चौहान को 59,906 मत हासिल हुए। पीस पार्टी की नाजिया सिद्दीकी 4,688 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।

स्वार में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी हिस्सेदारी के साथ सैनी और अन्य पिछड़े वर्गों, दलितों, सिखों, लोधी, जाट और क्षत्रिय मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। 2023 के उपचुनाव में बदला सत्ता-समीकरण 2027 में भी चर्चा का प्रमुख विषय रह सकता है।

चमरौआ: सपा की लगातार जीत पर रहेगी नजर

चमरौआ विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी ने लगातार दो चुनावों में जीत दर्ज की। 2022 में सपा के नसीर अहमद खान ने भाजपा के मोहन कुमार लोधी को 34,290 वोटों से पराजित किया था। नसीर अहमद खान को 1,00,976 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी को 66,686 वोट हासिल हुए। कांग्रेस के अली यूसुफ अली 18,213 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

इस सीट पर सपा के सामने अपना मजबूत प्रदर्शन दोहराने की चुनौती होगी। वहीं भाजपा यहां मुकाबले को अपने पक्ष में करने की कोशिश करेगी। 2027 में प्रत्याशियों के चयन और स्थानीय मुद्दों का चुनावी नतीजों पर असर अहम हो सकता है।

बिलासपुर: महज 307 वोटों ने तय की जीत-हार

बिलासपुर विधानसभा सीट पर 2022 का चुनाव बेहद करीबी रहा था। भाजपा के बलदेव सिंह औलख ने सपा के अमरजीत सिंह को केवल 307 वोटों से हराया था। बलदेव सिंह औलख को 1,01,998 और अमरजीत सिंह को 1,01,691 वोट मिले थे। बसपा के राम अवतार कश्यप 18,870 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

इस सीट का पिछला नतीजा बताता है कि यहां मामूली वोटों का अंतर भी जीत-हार का फैसला कर सकता है। बिलासपुर में मुस्लिम और सिख मतदाताओं के साथ अनुसूचित जाति, मौर्य, सैनी, कश्यप, यादव और सवर्ण वर्गों के मतदाताओं का समर्थन भी महत्वपूर्ण माना जाता है। 2027 में भाजपा के सामने सीट बचाने और सपा के सामने पिछली हार का अंतर मिटाने की चुनौती होगी।

मिलक सुरक्षित: भाजपा के सामने जीत दोहराने की चुनौती

मिलक (सुरक्षित) विधानसभा सीट पर 2022 में भाजपा की राजबाला सिंह ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने सपा के विजय सिंह को 5,912 वोटों से हराया। राजबाला सिंह को 97,948, जबकि विजय सिंह को 92,036 वोट मिले थे। बसपा के सुरेंद्र सिंह सागर 31,492 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट पर दलित मतदाताओं, खासकर जाटव समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके अलावा मुस्लिम और सैनी समेत अन्य पिछड़े वर्गों के मतदाता भी चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। भाजपा के सामने अपनी बढ़त बनाए रखने, जबकि सपा और बसपा के सामने समर्थन बढ़ाने की चुनौती रहेगी।

2027 में रामपुर की पांच सीटों पर किसकी चलेगी रणनीति?

रामपुर की पांचों विधानसभा सीटों का पिछला चुनावी रिकॉर्ड अलग-अलग राजनीतिक तस्वीर पेश करता है। रामपुर सदर और स्वार में उपचुनावों के बाद सत्ता-समीकरण बदले, चमरौआ में सपा ने लगातार जीत दर्ज की, जबकि बिलासपुर और मिलक में भाजपा ने सफलता हासिल की।

अब 2027 के चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा अपने पुराने प्रभाव वाले क्षेत्रों में वापसी कर पाती है या भाजपा और उसके सहयोगी दल अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखते हैं। हालांकि, पिछले चुनावों के नतीजे आगामी चुनाव की दिशा का संकेत तो देते हैं, लेकिन अंतिम फैसला मतदाताओं के रुख, उम्मीदवारों, चुनावी मुद्दों और दलों की रणनीति पर निर्भर करेगा।

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