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कैंची धाम से वृंदावन तक: नीम करौली बाबा ने यहीं क्यों ली महासमाधि?

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कंबल वाले बाबा की ख्याति पहाड़ों से निकलकर विदेशों तक पहुंची, लेकिन जीवन की अंतिम यात्रा उन्हें वृंदावन ले आई

लखनऊ।  उत्तराखंड की हसीन वादियों में बसे कैंची धाम का नाम लेते ही जिस संत की छवि सामने आती है, वह हैं नीम करौली बाबा। सादगी, सेवा और हनुमान भक्ति के लिए प्रसिद्ध बाबा का यह आश्रम आज देश-दुनिया में आस्था का बड़ा केंद्र है। लेकिन बाबा की कहानी सिर्फ कैंची धाम तक सीमित नहीं है।

जिस संत की आध्यात्मिक पहचान कैंची धाम से बनी, उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांस वृंदावन में ली। यही वजह है कि बाबा के भक्तों के लिए कैंची धाम जितना खास है, उतना ही महत्वपूर्ण वृंदावन भी है।

कैंची धाम कैसे बना बाबा की पहचान?

नैनीताल जिले में स्थित कैंची धाम बाबा की प्रमुख तपोस्थली और आश्रम के रूप में जाना जाता है। पहाड़ों के बीच बने इस आश्रम में बाबा ने साधना के साथ सेवा और प्रेम को जीवन का आधार बनाया। धीरे-धीरे बाबा की ख्याति आसपास के क्षेत्रों से निकलकर पूरे देश में फैलने लगी।

बाबा का पहनावा भी उनकी अलग पहचान बन गया था। वे अक्सर कंबल ओढ़े नजर आते थे। यही कारण था कि भक्त उन्हें प्यार से ‘कंबल वाले बाबा’ कहने लगे।

उनकी खासियत यह थी कि वे कठिन आध्यात्मिक बातों को भी बेहद सरल अंदाज में समझाते थे। उनके संदेशों में दिखावे से ज्यादा प्रेम, सेवा और मानवता पर जोर रहता था।

जब बाबा की ख्याति पहुंची विदेशों तक

समय के साथ नीम करौली बाबा का प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुंचा। अमेरिका समेत कई देशों के लोग उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए। बाबा से जुड़ी चर्चाओं में एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग जैसे नाम भी सामने आते रहे हैं।

यही वजह है कि आज कैंची धाम सिर्फ एक आश्रम नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक आकर्षण का केंद्र बन चुका है।

फिर वृंदावन से क्या था बाबा का रिश्ता?

कैंची धाम बाबा की तपोस्थली जरूर बना, लेकिन उनका आध्यात्मिक रिश्ता वृंदावन से भी गहरा था। भगवान कृष्ण की नगरी के रूप में प्रसिद्ध वृंदावन सदियों से संतों और साधकों की भूमि रही है।

बाबा की भक्ति में भगवान हनुमान का विशेष स्थान माना जाता है। उनके जीवन के अंतिम दिनों में वृंदावन की मौजूदगी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है कि यह स्थान लंबे समय से भारतीय संत परंपरा और आध्यात्मिक साधना का प्रमुख केंद्र रहा है।

ट्रेन से पहुंचे वृंदावन, फिर कभी नहीं लौटे

साल 1973 में बाबा की तबीयत बिगड़ने लगी थी। सितंबर की शुरुआत में वे आगरा की ओर गए थे। इसी दौरान उनकी तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। बताया जाता है कि उन्हें ट्रेन से वृंदावन लाया गया और इलाज के लिए रामकृष्ण मिशन अस्पताल में भर्ती कराया गया।

लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

11 सितंबर 1973 को नीम करौली बाबा ने वृंदावन में देह त्याग दी। उनके अनुयायी इस घटना को सामान्य मृत्यु नहीं, बल्कि ‘महासमाधि’ के रूप में याद करते हैं।

कैंची धाम तपोस्थली, वृंदावन समाधि स्थल

बाबा के जीवन की यही यात्रा उनकी आध्यात्मिक विरासत को खास बनाती है। एक तरफ पहाड़ों में स्थित कैंची धाम उनकी साधना और सेवा की पहचान बना, तो दूसरी ओर वृंदावन उनके जीवन का अंतिम पड़ाव।

आज कैंची धाम में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ हो या वृंदावन स्थित उनकी समाधि पर पहुंचने वाले भक्त—दोनों जगह एक ही संदेश सुनाई देता है: प्रेम करो, सेवा करो और मानवता को सबसे ऊपर रखो।

यही संदेश नीम करौली बाबा की उस विरासत को आज भी जीवित रखे हुए है, जो कैंची धाम से शुरू होकर वृंदावन तक पहुंची और फिर देश-दुनिया के करोड़ों लोगों की आस्था का हिस्सा बन गई।

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