रायपुर । छत्तीसगढ़ की लोक कला पंडवानी को देश और दुनिया में पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं। तीजन बाई ने रविवार सुबह करीब 3.15 बजे एम्स रायपुर में अंतिम सांस ली। वह पिछले कुछ समय से बीमार थीं और अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था।
पडंवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई
छत्तीसगढ़ के भिलाई के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने कम उम्र में ही पंडवानी गायन शुरू कर दिया था। महाभारत की कथाओं को अपनी दमदार आवाज, अभिनय और अनूठी प्रस्तुति के साथ मंच पर जीवंत करने की उनकी शैली ने इस लोक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
पहली बार 13 साल की उम्र में 10 रुपए के लिए गाया
तीजन का जन्म 8 अगस्त 1956 को भिलाई के पास के गनियारी गांव में हुआ था। साल 1988 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। तीजन बाई को साल 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभुषण से सम्मानित किया गया था। उन्होंने 13 की उम्र में पहली बार 10 रुपए के लिए गाया था। उन्होंने कापालिक शैली में पांडवानी गाई थी।
तीजन बाई ने परंपराओं को तोड़ बनाई अलग पहचान
महिलाओं के लिए उस दौर में पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ में प्रस्तुति देना वर्जित माना जाता था, लेकिन तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ते हुए मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई। तीजन बाई ने भारत के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी समेत अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोककला का डंका बजाया।
डॉ. तीजन बाई के निधन पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री साय ने जताया शोक
पद्म विभूषण से सम्मानित विश्वविख्यात पंडवानी कलाकार डॉ. तीजन बाई के निधन पर पूरे छत्तीसगढ़ में शोक की लहर है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए इसे राज्य ही नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
मुख्यमंत्री साय ने अपने शोक संदेश में कहा कि डॉ. तीजन बाई छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की अमर गाथाकार थीं। उन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा, सशक्त गायन शैली और पंडवानी कला के अद्भुत प्रस्तुतीकरण से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को विश्व मंच पर नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। लोक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन में उनका योगदान सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा— छत्तीसगढ़ ने अपनी अनमोल सांस्कृतिक धरोहर खो दी
मुख्यमंत्री ने कहा कि डॉ. तीजन बाई का जीवन लोककला के प्रति समर्पण, संघर्ष और उत्कृष्टता का प्रेरक उदाहरण है। उनकी कला और व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।उन्होंने प्रभु श्रीराम से प्रार्थना करते हुए दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करने तथा शोकाकुल परिजनों, उनके असंख्य प्रशंसकों और समस्त लोककला जगत को इस गहन दुःख को सहन करने की शक्ति देने की कामना की।
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