प्रयागराज।इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 82 के तहत उद्घोषणा जारी होने मात्र से उसकी अग्रिम जमानत पर विचार करने में पूरी तरह रोक नहीं लगती। हाईकोर्ट ने इस तर्क को मानते हुए गर्भवती नर्स मोनिका की अग्रिम जमानत मंजूर की।इस मामले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के आशा दुबे बनाम मध्य प्रदेश राज्य फैसले का हवाला दिया।

धारा 82 उद्घोषणा से अग्रिम जमानत पर रोक नहीं

जस्टिस गौतम चौधरी की बेंच ने कहा कि “सभी मामलों में अग्रिम जमानत अर्जी पर विचार करने पर पूरी रोक नहीं होती। विशेष परिस्थितियों में, जैसे इस मामले में याची गर्भवती थी और गैर-जमानती वारंट जारी होने के समय कोर्ट के सामने पेश नहीं हो सकी, तो यह अग्रिम जमानत के लिए उचित मामला है।”याची नर्स मोनिका के खिलाफ आईपीसी की धारा 316 (अजन्मे बच्चे की मृत्यु), 420 (धोखाधड़ी), 504, 120-B और मेडिकल काउंसिल एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज था। आरोप था कि वह उस अस्पताल में नर्स के रूप में कार्यरत थी, जहां कथित घटना हुई थी।

गर्भवती थी और 6 अक्टूबर को उसने एक बच्चे को जन्म दिया

शुरुआत में शिकायतकर्ता के वकील ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि चूंकि याची के खिलाफ पहले ही गैर-जमानती वारंट और धारा 82 व 83 के तहत उद्घोषणा जारी की जा चुकी थी, इसलिए अग्रिम जमानत पर विचार करना अनुचित है।हालांकि, याची की ओर से पेश अधिवक्ता ने बताया कि मोनिका केवल सह-आरोपी की देखरेख में कार्यरत थी और घटना में उसका कोई प्रत्यक्ष योगदान नहीं था। उन्होंने कहा कि चार्जशीट नवंबर 2024 में दायर की गई थी और मई 2025 में संज्ञान लिया गया, जबकि गैर-जमानती वारंट 10 अक्टूबर 2025 को जारी हुआ। उस समय याची गर्भवती थी और 6 अक्टूबर को उसने एक बच्चे को जन्म दिया था।

मानवीय परिस्थितियों का ध्यान रखना आवश्यक

हाईकोर्ट ने पाया कि याची संज्ञान के बाद व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए लगातार आवेदन करती रही, लेकिन इस पर विचार किए बिना उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया गया। अदालत ने इसे देखते हुए अग्रिम जमानत मंजूर की और कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में मानवीय परिस्थितियों का ध्यान रखना आवश्यक है।

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