बदायूं। शादी-ब्याह का मौसम आते ही शहर और गांव रंग-बिरंगी रोशनी, बैंड-बाजे और खुशियों से सराबोर हो उठते हैं। सजे-धजे दूल्हे, नाचते-गाते बाराती और चमचमाती लाइटें हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं। लेकिन इसी चमक-दमक के बीच एक ऐसा सच भी चलता है, जिस पर अक्सर किसी की नजर नहीं जाती। यह सच उन मासूम बच्चों का है, जिनके कंधों पर बारात की रोशनी तो होती है, लेकिन उनके अपने जीवन में अंधेरा पसरा रहता है।
वे दो वक्त की रोटी के लिए मेहनत करने को मजबूर
बारात के आगे-आगे चलने वाले इन बच्चों के कंधों पर भारी झूमर, गैस लाइट या बिजली की लाइटें होती हैं। कई बार वे घंटों तक लगातार चलते रहते हैं। रात गहराती जाती है, लेकिन उनकी ड्यूटी खत्म नहीं होती। चेहरे पर थकान, आंखों में नींद और पैरों में दर्द होने के बावजूद वे बिना शिकायत अपना काम करते रहते हैं। जिस उम्र में उन्हें स्कूल की किताबें पढ़नी चाहिए, दोस्तों के साथ खेलना चाहिए और बड़े सपने देखने चाहिए, उस उम्र में वे दो वक्त की रोटी के लिए मेहनत करने को मजबूर हैं।
आर्थिक तंगी उनके सपनों को बचपन में ही कुचल रही
बारात में मौजूद अधिकांश लोग इन बच्चों को केवल काम करने वाले मजदूर के रूप में देखते हैं। शायद ही कोई यह सोचता है कि यह भी किसी का बेटा है, किसी का भाई है, जिसके भी अपने सपने होंगे। कोई डॉक्टर बनना चाहता होगा, कोई शिक्षक, कोई पुलिस अधिकारी या इंजीनियर। लेकिन गरीबी, पारिवारिक मजबूरियां और आर्थिक तंगी उनके सपनों को बचपन में ही कुचल देती हैं।
रात में बारातों में लाइट उठाने में जाते है निकल
इन बच्चों का दिन भी आम बच्चों जैसा नहीं होता। कई बच्चे दिन में छोटे-मोटे काम करते हैं और रात में बारातों में लाइट उठाने निकल जाते हैं। देर रात या कई बार सुबह घर लौटने के बाद उन्हें आराम का भी पर्याप्त समय नहीं मिलता। लगातार मेहनत का असर उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और मानसिक विकास पर भी पड़ता है। कई बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं, जबकि कुछ की पढ़ाई बीच-बीच में बाधित होती रहती है।
यह तस्वीर कई शहरों और कस्बों में मिलती है देखने को
बाल श्रम कानूनों के बावजूद यह तस्वीर कई शहरों और कस्बों में देखने को मिल जाती है। यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है। जब तक गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी जैसी समस्याओं का प्रभावी समाधान नहीं होगा, तब तक ऐसे बच्चों का बचपन इसी तरह जिम्मेदारियों के बोझ तले दबता रहेगा।जरूरत इस बात की है कि ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें शिक्षा से जोड़ा जाए। सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचे, ताकि माता-पिता आर्थिक मजबूरी में अपने बच्चों से मजदूरी न कराएं। सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और आम नागरिकों को भी आगे आकर इन बच्चों के जीवन में बदलाव लाने का प्रयास करना होगा।
बारात में ऐसे बच्चे देखे तो उसके बचपन को महसूस करें
अगर हम किसी बारात में ऐसे किसी बच्चे को देखें, तो केवल उसकी मेहनत को न देखें, बल्कि उसके भीतर छिपे उस अधूरे बचपन को भी महसूस करें, जो परिस्थितियों की वजह से समय से पहले बड़ा होने पर मजबूर हो गया है। बारात की चमक कुछ घंटों की होती है, लेकिन हर बच्चे के जीवन में शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान की रोशनी हमेशा के लिए जलनी चाहिए। जब हर मासूम के हाथ में झूमर की जगह किताब होगी और कंधों से मजदूरी का बोझ हटेगा, तभी हम सही मायनों में एक संवेदनशील और विकसित समाज की कल्पना कर सकेंगे।
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