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107 दिन की जंग के बाद शांति की राह! अमेरिका-ईरान समझौते से खुल सकता है होर्मुज, भारत को कितनी राहत?

वॉशिंगटन/तेहरान/दोहा। करीब साढ़े तीन महीने से मध्य पूर्व को अस्थिरता के दौर में धकेलने वाले अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच अब शांति की उम्मीद नजर आने लगी है। 28 फरवरी से शुरू हुई जंग के 107 दिन पूरे होने के बाद दोनों देशों के बीच एक अंतरिम शांति समझौते का मसौदा तैयार होने की खबरें सामने आई हैं।

अंतिम हस्ताक्षर से पहले कई मुद्दों पर सहमति आवश्यक

यदि यह समझौता अंतिम रूप ले लेता है तो न केवल मध्य पूर्व में तनाव कम होगा, बल्कि वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और भारत जैसी ऊर्जा आयातक अर्थव्यवस्थाओं को भी बड़ी राहत मिल सकती है।सूत्रों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच तैयार किए गए मसौदे में युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने, ईरानी तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में ढील, परमाणु कार्यक्रम पर नई सहमति और आर्थिक पुनर्निर्माण जैसे कई अहम बिंदु शामिल हैं। हालांकि समझौते की शर्तों को लेकर अभी भी कुछ सवाल बने हुए हैं और अंतिम हस्ताक्षर से पहले कई मुद्दों पर सहमति आवश्यक होगी।

तत्काल युद्धविराम पर जोर

प्रस्तावित समझौते की सबसे महत्वपूर्ण शर्त तत्काल और स्थायी युद्धविराम है। इसके तहत केवल अमेरिका और ईरान ही नहीं, बल्कि लेबनान सहित क्षेत्र के अन्य संघर्ष प्रभावित मोर्चों पर भी सैन्य गतिविधियों को रोकने का प्रस्ताव है। माना जा रहा है कि ईरान शुरू से ही किसी भी शांति प्रक्रिया को व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष विराम से जोड़ना चाहता था और अमेरिका ने इस मांग को काफी हद तक स्वीकार कर लिया है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्धविराम सफल रहता है तो इससे पूरे पश्चिम एशिया में स्थिरता लौटने की संभावना बढ़ जाएगी, जहां पिछले कई महीनों से सैन्य टकराव और हमलों के कारण तनाव चरम पर पहुंच गया था।

होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया की सांसें जिस रास्ते पर टिकी हैं

इस समझौते का सबसे बड़ा और सबसे चर्चित पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने का प्रस्ताव है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है। युद्ध शुरू होने के बाद इस मार्ग पर गंभीर संकट पैदा हो गया था, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई और तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला।

30 दिनों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोला जाएगा

समझौते के मसौदे के अनुसार 30 दिनों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोला जाएगा। ईरान इस क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था संभालेगा और जलमार्ग को सुरक्षित बनाने के लिए युद्धकाल में बिछाई गई खदानों को हटाएगा। अमेरिका चाहता था कि इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर कोई शुल्क न लगाया जाए, जबकि ईरान इसके उपयोग के बदले राजस्व चाहता था। अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ कि ईरान टोल नहीं वसूलेगा, लेकिन सेवा शुल्क लेने का अधिकार उसके पास रहेगा।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल और गैस से पूरा करता है। देश की तेल आपूर्ति का एक बड़ा भाग होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। ऐसे में इस मार्ग के बंद होने से भारत पर सीधा असर पड़ा था। शिपिंग लागत बढ़ी, ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ीं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा हो गया।

शिपिंग लागत पूरी तरह कम नहीं होगी

यदि समझौते के तहत होर्मुज दोबारा खुलता है और तेल की आपूर्ति सामान्य होती है तो भारत को राहत मिल सकती है। तेल कीमतों में संभावित गिरावट का असर पेट्रोल, डीजल, परिवहन लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि सेवा शुल्क लागू होने से शिपिंग लागत पूरी तरह कम नहीं होगी, इसलिए राहत सीमित भी हो सकती है।

ईरानी तेल की वापसी से बदल सकता है बाजार

समझौते के मसौदे में अमेरिका द्वारा ईरानी तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से निलंबित करने की बात कही गई है। इसके तहत ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजार में फिर से तेल बेचने की अनुमति मिल सकती है।

ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि ईरान बड़े पैमाने पर तेल निर्यात शुरू करता है तो वैश्विक बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी और कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बनेगा। इसका फायदा भारत सहित कई देशों को मिल सकता है। भारत और ईरान के बीच अतीत में तेल व्यापार के मजबूत संबंध रहे हैं और ईरान भारतीय कंपनियों को अपेक्षाकृत बेहतर भुगतान शर्तों पर तेल उपलब्ध कराता रहा है।

परमाणु कार्यक्रम पर नई सहमति

समझौते का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा है। मसौदे के अनुसार ईरान को शांतिपूर्ण नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम जारी रखने की अनुमति दी जाएगी, जबकि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराएगा। इसके साथ ही संवर्धित यूरेनियम के भंडार को कम करने और अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर भी चर्चा की गई है।यह मुद्दा लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच विवाद का मुख्य कारण रहा है। ऐसे में यदि इस क्षेत्र में सहमति बनती है तो यह दोनों देशों के संबंधों में एक बड़ा बदलाव माना जाएगा।

अभी बाकी हैं कई चुनौतियां

हालांकि शांति समझौते को लेकर सकारात्मक माहौल बन रहा है, लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जो भविष्य में विवाद का कारण बन सकते हैं। इनमें ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों को समर्थन, प्रतिबंधों की पूर्ण समाप्ति और पुनर्निर्माण सहायता जैसे विषय शामिल हैं।

दुनिया की नजरें इस संभावित समझौते पर टिकी

फिलहाल दुनिया की नजरें इस संभावित समझौते पर टिकी हैं। यदि यह सफल होता है तो न केवल अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौट सकती है और भारत जैसे देशों को भी आर्थिक राहत मिल सकती है। 107 दिनों की जंग के बाद अब पूरी दुनिया यह देखने का इंतजार कर रही है कि क्या यह शांति प्रयास वास्तव में इतिहास बदल पाएगा।

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