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करियर बनाने आए थे, पर आग ने निगल लिए सपने: अलीगंज अग्निकांड में 15 छात्रों की दर्दनाक मौत, सिस्टम पर उठे सवाल

सीएम योगी और रक्षा मंत्री ने किया घटनास्थल का दौरा

लखनऊ। वे अपने घरों से बड़े सपने लेकर निकले थे—किसी को इंजीनियर बनना था, किसी को एनिमेशन की दुनिया में नाम कमाना था, तो कोई कोचिंग के सहारे अपने करियर की सीढ़ियां चढ़ रहा था। परिवारों ने अपनी बचत, उम्मीद और भरोसे के साथ उन्हें लखनऊ भेजा था। लेकिन किसे पता था कि जिस इमारत में उनके सपनों को आकार मिलना था, वही इमारत एक दिन उनकी जिंदगी का अंतिम पड़ाव बन जाएगी।

इस घटना ने पूरे शहर को हिला दिया

अलीगंज के सेक्टर-डी में स्थित एक तीन मंजिला इमारत सोमवार को अचानक ऐसी त्रासदी का केंद्र बन गई, जिसने पूरे शहर को हिला कर रख दिया। इस इमारत में कोचिंग क्लास, 3D एनीमेशन ट्रेनिंग सेंटर और गेमिंग से जुड़े कोर्स चलते थे। दिनभर यहां छात्रों की आवाजाही रहती थी, हंसी-ठिठोली होती थी और भविष्य की योजनाएं बनती थीं। लेकिन एक दोपहर ने सब कुछ बदल दिया।

कुछ ही मिनटों में खुशियों से मातम तक

दोपहर करीब ढाई बजे का वक्त था। इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित पेट शॉप और उसके वेयरहाउस में अचानक धुआं उठना शुरू हुआ। शुरुआत में किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन कुछ ही मिनटों में यह धुआं आग की लपटों में बदल गया। देखते ही देखते आग ने पूरी इमारत को अपनी चपेट में ले लिया।

आग तेजी से सीढ़ियों और गलियारों तक फैल गई

ऊपर की मंजिलों पर उस समय दर्जनों छात्र-छात्राएं अपनी कक्षाओं में मौजूद थे। कोई नोट्स बना रहा था, कोई कंप्यूटर पर काम सीख रहा था, तो कोई अपने सपनों को स्क्रीन पर आकार दे रहा था। अचानक धुएं की तीखी गंध ने माहौल को बदल दिया। लोग कुछ समझ पाते, इससे पहले ही आग तेजी से सीढ़ियों और गलियारों तक फैल गई।

जब दरवाजे बन गए जाल

सबसे भयावह स्थिति दूसरी और तीसरी मंजिल पर बनी, जहां छात्र फंस गए। सीढ़ियों की ओर भागने की कोशिश में कई लोग धुएं और आग के बीच घिर गए। कुछ ने खिड़कियों से बाहर झांककर मदद की गुहार लगाई, लेकिन आग की लपटें इतनी तेज थीं कि बाहर निकलना लगभग असंभव हो गया था।

कुछ छात्रों ने जान बचाने के लिए इमारत से छलांग लगा दी

कुछ छात्रों ने जान बचाने के लिए इमारत से छलांग लगा दी। यह दृश्य इतना दर्दनाक था कि वहां मौजूद लोगों की चीखें भी थम गईं। जो बाहर खड़े थे, वे अपने दोस्तों और साथियों को बचा नहीं सके। कुछ लोग अंदर फंसे अपने साथियों को नाम लेकर पुकारते रहे, लेकिन जवाब सिर्फ आग की चटकती आवाजें थीं।

दम घुटने से ज्यादा गई जानें

प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि अधिकांश मौतें दम घुटने (स्मोक इनहलेशन) की वजह से हुई हैं। आग की लपटों से ज्यादा घातक वह धुआं साबित हुआ जिसने पूरी इमारत को जहरीला बना दिया। कई छात्र वहीं बेहोश होकर गिर पड़े और फिर कभी नहीं उठ सके। यह सिर्फ एक आग नहीं थी, यह एक धीमी मौत थी, जो हर मंजिल पर अपनी कहानी लिख रही थी।

रेस्क्यू की जंग, लेकिन समय हार गया

सूचना मिलते ही स्थानीय लोग, पुलिस, दमकल विभाग और एसडीआरएफ की टीमें मौके पर पहुंचीं। लेकिन सबसे बड़ा आरोप यही है कि मदद समय पर नहीं पहुंची। कहा जा रहा है कि दमकल की पहली गाड़ी लगभग 40 मिनट की देरी से पहुंची, तब तक आग पूरी इमारत में फैल चुकी थी।

करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया

रेस्क्यू टीमों ने हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म और अन्य उपकरणों की मदद से अंदर फंसे लोगों को निकालने की कोशिश की, लेकिन घना धुआं और आग की तीव्रता ने काम को बेहद मुश्किल बना दिया। करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया, लेकिन तब तक 15 जिंदगियां हमेशा के लिए खत्म हो चुकी थीं।

वे नाम जो अब सिर्फ याद हैं

मलबे से जब शव बाहर निकाले गए तो हर किसी की आंखें नम थीं। कोई 18 साल का छात्र था, कोई 27 साल का युवा। किसी के माता-पिता ने अपनी पूरी जमा पूंजी उसकी पढ़ाई में लगा दी थी, तो कोई अपने परिवार की उम्मीदों का एकमात्र सहारा था। सुखमनी, आदित्य श्रीवास्तव, अम्मार, नीलेश, संयम, शहजान, ज्योति, सागर, सूरज—ये सिर्फ नाम नहीं हैं, ये वो सपने हैं जो अब कभी पूरे नहीं होंगे। उनके घरों में अब चुप्पी है। मांओं की आंखों में आंसू हैं, पिता की आवाजें टूट चुकी हैं, और भाई-बहनों के सवाल अनुत्तरित रह गए हैं—“कब लौटेगा हमारा भाई?”

सिस्टम पर सवालों की आग

हादसे के बाद प्रशासन हरकत में आया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अलीगढ़ का दौरा बीच में छोड़कर लखनऊ पहुंचकर घटनास्थल का निरीक्षण किया। उन्होंने केजीएमयू में घायलों से मुलाकात की और हर संभव मदद का आश्वासन दिया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी दिल्ली से लखनऊ पहुंचे और घायलों का हाल जाना। लेकिन इन उच्च स्तरीय दौरों के बीच एक सवाल लगातार गूंजता रहा—क्या यह सब पहले नहीं हो सकता था?

जांच, निलंबन और गिरफ्तारियां

सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच दल (SIT) गठित किया है, जिसे सात दिनों में रिपोर्ट देनी है। चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है और छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, जिनमें से चार गिरफ्तार हो चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ कार्रवाई से खोई हुई जिंदगियां वापस आ सकती हैं?

देरी जिसने बढ़ा दिया दर्द

स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि दमकल समय पर पहुंच जाती, तो शायद कुछ जानें बचाई जा सकती थीं। एंबुलेंस सेवाओं में भी देरी की शिकायतें सामने आईं। एक आपातकालीन कॉल सिस्टम पर भी सवाल उठे, जहां लोग एक नंबर से दूसरे नंबर पर भेजे जाते रहे। यह सिर्फ एक तकनीकी विफलता नहीं थी, यह मानव जीवन की कीमत पर हुई देरी थी।

अंतिम दृश्य: एक शहर का टूटना

जब अस्पतालों में शव पहुंचे, तो परिजनों की चीखें पूरे परिसर में गूंज उठीं। कोई अपने बेटे का हाथ पकड़कर रो रहा था, तो कोई बेटी की तस्वीर से बात कर रहा था। हर शव एक अधूरी कहानी, एक टूटा हुआ सपना और एक उजड़ा हुआ घर था। पोस्टमार्टम हाउस के बाहर खड़े लोग बार-बार एक ही सवाल पूछ रहे थे—“क्या हमारे बच्चों की जान बचाई जा सकती थी?”

एक सवाल जो रह गया हमेशा के लिए

आज अलीगंज की वह इमारत सिर्फ एक ढांचा नहीं रही। वह 15 जिंदगियों की चिता बन गई है, जहां सपने जलकर राख हो गए। यह हादसा सिर्फ आग नहीं था, यह एक व्यवस्था की परीक्षा थी, जिसमें कई सवाल अनुत्तरित रह गए।क्या सुरक्षा नियम सिर्फ फाइलों तक सीमित रहेंगे?, क्या हर हादसे के बाद ही सिस्टम जागेगा? और क्या इन 15 परिवारों को कभी इंसाफ मिल पाएगा?इन सवालों के बीच एक सन्नाटा है, जो पूरे शहर में फैल चुका है—और शायद लंबे समय तक नहीं टूटेगा।

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