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लखनऊ अग्निकांड: धुएं में खो गए सपने, राख में बदल गई दोस्ती की कहानी

लखनऊ । यूपी की राजधानी के अलीगंज की वह दोपहर सामान्य नहीं थी। तीन मंजिला इमारत के भीतर चल रहे कोचिंग और एनीमेशन सेंटर में दर्जनों छात्र अपने भविष्य को रंग देने में जुटे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही पलों में यह इमारत मौत का ऐसा जाल बन जाएगी, जहां से निकलना आसान नहीं होगा।

आग लगी और फिर सब कुछ—हंसी, सपने, आवाजें—धुएं में घुलकर रह गया।इसी आग में 15 छात्रों की मौत हो गई। लेकिन इन 15 कहानियों के बीच दो नाम ऐसे थे, जिनकी दोस्ती मोहल्लों, स्कूल और काम की दुनिया तक मिसाल बन चुकी थी—कानपुर के सूरज और संयम।

बचपन की दोस्ती, जो आखिरी सांस तक साथ रही

गोविंदनगर और बर्रा के रहने वाले सूरज और संयम बचपन से ही एक-दूसरे के साथ थे। रतनलालनगर के दून स्कूल में उन्होंने साथ पढ़ाई की, साथ सपने देखे और फिर करियर की तलाश में एक ही एनीमेशन स्टूडियो में नौकरी भी जॉइन की। दोनों के परिवारों को भी लगता था कि यह दोस्ती आगे चलकर सफलता की कहानी बनेगी, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि यह दोस्ती एक ही चिता पर खत्म होगी।

वह दोपहर, जब सब बदल गया

हादसे के दिन अलीगंज स्थित इमारत में रोज़ की तरह क्लास चल रही थी। ग्राउंड फ्लोर पर पेट शॉप और वेयरहाउस था, ऊपर की मंजिलों पर एनीमेशन और कोचिंग सेंटर। दोपहर करीब ढाई बजे अचानक वेयरहाउस में आग भड़क उठी। शुरुआत छोटी थी, लेकिन कुछ ही मिनटों में उसने पूरी इमारत को अपनी गिरफ्त में ले लिया।

धुआं इतनी तेजी से फैला कि दूसरी और तीसरी मंजिल पर मौजूद छात्रों को बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिला। कुछ ने खिड़कियों की ओर भागकर मदद मांगी, कुछ सीढ़ियों की तरफ दौड़े, और कुछ ने जान बचाने के लिए बिल्डिंग से कूदने की कोशिश की। लेकिन आग और धुएं का दबाव इतना भयानक था कि बचाव की हर कोशिश अधूरी रह गई।

आखिरी लम्हों में भी साथ रहे सूरज और संयम

परिजनों के अनुसार सूरज और संयम आखिरी बार भी एक साथ ही देखे गए। दोनों ने शायद बचने की कोशिश में किसी कमरे या बाथरूम में खुद को बंद कर लिया था, लेकिन धुआं वहां तक भी पहुंच गया। उनकी मौत दम घुटने से हुई। शरीर झुलसे हुए मिले, लेकिन सबसे दर्दनाक बात यह थी कि वे आखिरी समय तक भी एक-दूसरे के साथ थे।यह सिर्फ एक हादसा नहीं था, यह उस दोस्ती का अंत था जो बचपन से शुरू होकर सपनों तक पहुंची थी और वहीं खत्म हो गई।

घरों में पसरा सन्नाटा

संयम का शव जब गोविंदनगर 11 ब्लॉक स्थित घर पहुंचा, तो मां सोनिया की चीख ने पूरे माहौल को तोड़ दिया। “कुछ तो बोल बेटा… ऐसे कैसे चला गया?” यह शब्द हर किसी के दिल को चीर रहे थे। रिश्तेदार और पड़ोसी चुपचाप खड़े थे, किसी की आंखें सूखी नहीं थीं।

इसी तरह सूरज के घर में भी मातम का ऐसा दृश्य था कि हर कोई टूट गया। मां मीरा बेटे के शव से लिपटकर बार-बार बेहोश हो जाती थीं। उन्हें यही याद आ रहा था कि बेटा कुछ ही घंटे पहले कहकर गया था कि वह सुरक्षित है, लेकिन लौटकर वह खुद नहीं आया।

अधूरी रह गई जिम्मेदारियां

सूरज अपने परिवार की रीढ़ था। तीन साल पहले पिता की मौत के बाद उसने घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली थी। छोटे भाई-बहन की पढ़ाई, घर का खर्च और भविष्य की उम्मीदें सब उसी पर थीं। वह हाल ही में शादी के लिए लड़की देखने भी गया था। परिवार में खुशी का माहौल बनने वाला था, लेकिन अब सब कुछ खत्म हो चुका था।

आग, जो सिर्फ इमारत नहीं जलाती

हादसे के दौरान SDRF और दमकल विभाग ने राहत कार्य शुरू किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 15 शव बाहर निकाले गए और कई घायल अस्पताल पहुंचाए गए।यह हादसा सिर्फ एक इमारत की आग नहीं था। यह उस सिस्टम पर सवाल था, जहां सुरक्षा इंतजाम अक्सर कागजों में मजबूत दिखते हैं, लेकिन जमीन पर कमजोर साबित होते हैं।

अंतिम विदाई, जो कभी नहीं भूल पाएंगे लोग

दोनों दोस्तों का अंतिम संस्कार अलग-अलग घाटों पर किया गया। लेकिन हर किसी की आंखों में एक ही तस्वीर थी—दो बचपन के दोस्त, जो साथ जीए और साथ ही दुनिया छोड़ गए।मोहल्ले में लोग कह रहे थे कि सूरज और संयम की दोस्ती अब कहानी नहीं, एक दर्द बन चुकी है। ऐसा दर्द, जो समय के साथ भी हल्का नहीं होगा।

एक सवाल, जो रह गया पीछे

इस हादसे ने सिर्फ 15 परिवारों को नहीं तोड़ा, बल्कि कई सपनों को भी राख में बदल दिया। सवाल यह है कि क्या ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था? और अगर हां, तो इंतजार किसका है?लखनऊ की वह आग बुझ गई, लेकिन सूरज और संयम की कहानी हमेशा के लिए उस धुएं में कैद हो गई, जहां से कोई वापसी नहीं होती।

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