नई दिल्ली। लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के गिरने के बाद सियासी गलियारों में नई बहस छिड़ गई है—क्या यह सरकार के लिए बड़ा झटका है या फिर सोची-समझी रणनीति यानी ‘मास्टरस्ट्रोक’?गुरुवार और शुक्रवार को भारतीय जनता पार्टी और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर जोरदार बहस हुई। सरकार ने विपक्ष का समर्थन हासिल करने की कोशिश की, लेकिन दो-तिहाई बहुमत न जुटा पाने के कारण विधेयक पास नहीं हो सका।

क्या यह सरकार के लिए झटका है?

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इसे सरकार के लिए बड़ा झटका मान रहा है।

पिछले 12 वर्षों में यह पहला मौका है जब केंद्र सरकार का कोई संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में गिरा

सरकार को संख्या बल की कमी का अंदाजा था, फिर भी बिल लाया गया

इसे सरकार की साख पर असर डालने वाला माना जा रहा है

विशेषज्ञों का कहना है कि चुनावी माहौल के बीच बिल लाना एक जोखिम भरा कदम था, जो सफल नहीं हो सका।

या फिर ‘मास्टरस्ट्रोक’?

दूसरी ओर, कुछ जानकार इसे रणनीतिक कदम मान रहे हैं। उनका तर्क है—

सरकार पहले से जानती थी कि बिल पास कराना आसान नहीं होगा

इसके बावजूद बिल लाकर उसने महिलाओं के मुद्दे पर अपनी सक्रियता दिखा दी

अब सरकार विपक्ष को “महिला आरक्षण विरोधी” बताकर राजनीतिक लाभ लेने की स्थिति में है

यानी, भले ही बिल पास न हुआ हो, लेकिन राजनीतिक संदेश देने में सरकार सफल मानी जा रही है।

चुनावी नजरिया भी अहम

विशेषकर पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत जैसे राज्यों को ध्यान में रखते हुए इस बिल को देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि—

सरकार महिलाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है

विपक्ष के विरोध को मुद्दा बनाकर चुनावी रणनीति तैयार की जा सकती है

‘हमने कोशिश की, विपक्ष ने रोका’

अब भाजपा यह संदेश देने की स्थिति में है कि उसने महिलाओं को 33% आरक्षण देने की पूरी कोशिश की, लेकिन विपक्ष के समर्थन के अभाव में बिल पास नहीं हो सका।

करीब चार दशक से लंबित इस मुद्दे को लेकर भाजपा गांव-गांव तक अभियान चलाने की तैयारी में है।

महिला आरक्षण बिल का गिरना एक तरफ जहां संसदीय हार है, वहीं दूसरी तरफ इसे सियासी रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह फैसला भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित होता है या फिर चुनावी फायदे में बदल जाता है।

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