कानपुर। कानपुर के किदवईनगर में हुए दोहरे हत्याकांड ने एक पूरे परिवार की दुनिया उजाड़ दी है। जिस घर में कभी दो जुड़वां बेटियों की खिलखिलाहट गूंजती थी, वहां अब सिर्फ सन्नाटा और आंसुओं की दीवारें रह गई हैं। इस दर्द के बीच मां रेशमा ने अब कानपुर छोड़कर अपने मायके पश्चिम बंगाल लौटने का फैसला कर लिया है।कहा जा रहा है कि रेशमा अब उस घर में एक पल भी नहीं रह पा रही हैं, जहां हर कोना उन्हें अपनी बेटियों की आखिरी यादों से घेर लेता है। कभी जो घर जीवन और उम्मीदों से भरा था, आज वही घर उनके लिए एक दर्दनाक कैद बन गया है।
“दीदी… उसने मेरी बच्चियों को छीन लिया…”
सोमवार को जब रेशमा के भाई बालबहादुर और बहन हेमा छेत्री सिलीगुड़ी से कानपुर पहुंचे, तो माहौल और भी भावुक हो गया। जैसे ही रेशमा ने उन्हें देखा, वह खुद को रोक नहीं पाईं और फूट-फूटकर रो पड़ीं।“दीदी… उसने मेरी बच्चियों को मार डाला…” यह कहते हुए वह अपनी बहन के गले लगकर बुरी तरह बिलख उठीं। वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। बहन ने किसी तरह उन्हें संभाला और कहा कि अब वे उन्हें इस दर्द से बाहर निकालने की कोशिश करेंगी।
“जहां बेटियों की हंसी थी, अब वहां सन्नाटा है”
परिवार का कहना है कि रेशमा ने शादी के बाद ब्यूटी पार्लर की नौकरी छोड़ दी थी और पूरी जिंदगी अपनी जुड़वां बेटियों के आसपास समेट ली थी। अब वही बेटियां इस दुनिया में नहीं हैं।फ्लैट के भीतर की हर चीज—खिलौने, कपड़े, दीवारें—अब उन्हें उस काली रात की याद दिलाती हैं। परिवार का कहना है कि रेशमा कई बार घंटों तक चुपचाप बैठी रहती हैं और बस बच्चों को याद करती रहती हैं।
अब सिर्फ एक ही फैसला—यहां से दूर जाना
परिजनों ने बताया कि रेशमा अब इस माहौल में नहीं रह सकतीं। इसलिए उन्होंने तय किया है कि जल्द ही उन्हें पश्चिम बंगाल ले जाया जाएगा, जहां परिवार और अपनों के बीच वे धीरे-धीरे इस गहरे आघात से उबर सकें।भाई ने कहा कि “यह सिर्फ घर छोड़ने का फैसला नहीं है, यह उस दर्द से दूर जाने की कोशिश है जो हर पल उन्हें तोड़ रहा है।”
जांच में सामने आ रहे हैं भयावह तथ्य
इधर पुलिस जांच में सामने आया है कि घटना से पहले आरोपी पिता के फोन कॉल, सीसीटीवी फुटेज और रात के घटनाक्रम ने पूरे मामले को और भी भयावह बना दिया है। पुलिस का कहना है कि घर के भीतर तनाव, विवाद और शराब की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
एक परिवार जो कभी हंसता था… अब बिखर गया
कभी जिस घर में बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सिर्फ दीवारें बोलती हैं—खामोशी की भाषा में। रेशमा के लिए अब यह शहर सिर्फ एक दर्द की याद बनकर रह गया है।
