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बिजली क्षेत्र में संविदा कर्मियों की छटनी पर आक्रोश, गर्मियों में व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका

लखनऊ । विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने आरोप लगाया है कि बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण की तैयारी के तहत बड़े पैमाने पर संविदा कर्मियों की छटनी की जा रही है, जिससे प्रदेश की बिजली व्यवस्था पर संकट खड़ा हो सकता है। समिति का कहना है कि गर्मियों के मौसम में इसका सीधा असर बिजली आपूर्ति पर पड़ सकता है।संघर्ष समिति के पदाधिकारियों के अनुसार नए टेंडरों में तय मानकों के विपरीत लगभग 45 प्रतिशत तक संविदा कर्मियों की संख्या कम कर दी गई है। इसके चलते प्रदेश के कई जनपदों में कर्मचारियों के बीच आक्रोश बढ़ गया है और विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं।

25 हजार संविदा कर्मियों को सेवा से हटाया जा चुका

समिति का कहना है कि संविदा कर्मियों को हटाने की प्रक्रिया अक्टूबर 2024 से शुरू की गई थी। बाद में नवंबर 2024 में बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण का निर्णय सार्वजनिक किया गया। अब तक लगभग 25 हजार संविदा कर्मियों को सेवा से हटाया जा चुका है।संघर्ष समिति के अनुसार वर्ष 2017 में विद्युत उपकेंद्रों पर संविदा कर्मियों की तैनाती के लिए स्पष्ट मानक तय किए गए थे।

इन मानकों के अनुसार शहरी क्षेत्रों के प्रत्येक विद्युत उपकेंद्र पर 36 और ग्रामीण क्षेत्रों में 20 संविदा कर्मियों की तैनाती होनी चाहिए थी। लेकिन वर्तमान में जारी टेंडरों में शहरी क्षेत्रों में 36 के स्थान पर लगभग 18 और ग्रामीण क्षेत्रों में 20 के स्थान पर करीब 12 कर्मियों की व्यवस्था की जा रही है, जिससे बड़ी संख्या में कर्मियों की छटनी हो रही है।

निजीकरण के बाद कई जगहों पर बिजली दरों में बढ़ोतरी

समिति ने यह भी कहा कि कई संविदा कर्मियों ने 20 से 25 वर्षों तक बिजली व्यवस्था को संभालने में योगदान दिया है और जोखिम भरे हालात में काम किया है। ऐसे कर्मियों को हटाया जाना अमानवीय है और इससे बिजली व्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।संघर्ष समिति का कहना है कि बिजली क्षेत्र के निजीकरण से उपभोक्ताओं को लाभ मिलने के बजाय निजी कंपनियों को फायदा हो सकता है।

उन्होंने अन्य राज्यों के उदाहरण देते हुए कहा कि निजीकरण के बाद कई जगहों पर बिजली दरों में बढ़ोतरी देखी गई है।समिति ने चेतावनी दी है कि यदि बड़े पैमाने पर अनुभवी कर्मियों को हटाया गया तो गर्मियों के दौरान बिजली व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर इसकी जिम्मेदारी बिजली प्रबंधन की होगी।संघर्ष समिति के आह्वान पर बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण के विरोध में प्रदेश के विभिन्न जनपदों और परियोजनाओं में कर्मचारियों का आंदोलन लगातार जारी है और कर्मचारी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

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