राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्थापना दिवस समारोह में बोले मुख्य न्यायाधीश—सिर्फ नल कनेक्शन देना काफी नहीं, स्वच्छ और भरोसेमंद जलापूर्ति सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी
नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने सुरक्षित पेयजल को गरिमापूर्ण जीवन और मानवाधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताते हुए कहा कि सरकार की जिम्मेदारी केवल पानी की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि लोगों को जरूरत के समय स्वच्छ, सुरक्षित और भरोसेमंद पानी मिल सके।
सोमवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 33वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए सीजेआई ने कहा कि पानी तक पहुंच स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और मानवीय गरिमा से सीधे जुड़ी है। उन्होंने जलापूर्ति से संबंधित चुनौतियों के समाधान के लिए प्रभावी व्यवस्थाएं विकसित करने और विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया।
पानी के बिना गरिमापूर्ण जीवन अधूरा
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि पानी केवल जीवन की बुनियादी जरूरत नहीं, बल्कि अन्य अधिकारों का लाभ उठाने के लिए भी आवश्यक है। जिन समुदायों को नियमित और भरोसेमंद जलापूर्ति नहीं मिलती, वे संविधान में निहित गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार का पूरी तरह लाभ नहीं उठा पाते।
उन्होंने बताया कि पानी की कमी का असर समाज के अलग-अलग वर्गों पर पड़ता है। खासकर उन महिलाओं को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिन्हें पानी जुटाने में घंटों बिताने पड़ते हैं। वहीं, सिंचाई के लिए पानी पर निर्भर किसानों की आजीविका भी इससे प्रभावित होती है।
नल कनेक्शन के साथ पानी की गुणवत्ता भी जरूरी
देश में पेयजल की पहुंच बढ़ाने और ग्रामीण परिवारों तक नल कनेक्शन पहुंचाने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस दिशा में हुई प्रगति सराहनीय है। हालांकि, अब जलापूर्ति की गुणवत्ता और सुरक्षा पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि घर में नल लगा होना ही सुरक्षित पानी की उपलब्धता का प्रमाण नहीं है। आर्सेनिक, फ्लोराइड और अन्य हानिकारक तत्वों से दूषित पानी लोगों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए जलापूर्ति की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे लोगों को नियमित रूप से सुरक्षित पेयजल मिल सके।
स्वच्छ पानी का अधिकार संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा
सीजेआई ने कहा कि जीवन के अधिकार की संवैधानिक व्याख्या समय के साथ व्यापक हुई है। अब गरिमापूर्ण जीवन के लिए स्वास्थ्य, भोजन, आवास, आजीविका और स्वच्छ पर्यावरण जैसी आवश्यकताओं को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
उन्होंने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े उच्चतम न्यायालय के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन के अधिकार में प्रदूषणमुक्त पानी और हवा का आनंद लेने का अधिकार भी शामिल है। ऐसे में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारियों का अहम हिस्सा है।
जल संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
मुख्य न्यायाधीश ने जल संबंधी समस्याओं की वास्तविक स्थिति सामने लाने में नागरिक समाज की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक ज्ञान, व्यावहारिक अनुभव और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से पानी से जुड़ी चुनौतियों का बेहतर समाधान तलाशा जा सकता है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पानी सीमाओं से परे है, इसलिए इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयासों में भी समन्वय और व्यापक दृष्टिकोण जरूरी है।
आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी जिम्मेदारी
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि पानी के अधिकार को केवल वर्तमान पीढ़ी की जरूरत के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे भविष्य के प्रति जिम्मेदारी से भी जोड़कर समझना होगा। जल संसाधनों का संरक्षण और सुरक्षित पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी सम्मान और गरिमा के साथ अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें।
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