नई दिल्ली । सर्वोच्च अदालत में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के साथ अन्य न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को बढ़ाने से संबंधित प्रावधान वाला विधेयक संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद पूरी तरह से कानून का रूप लेने के रास्ते पर है। अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा। इस विधेयक में सुप्रीम कोर्ट में स्वीकृत न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करने का प्रावधान है। हालांकि इस नए संशोधन को लेकर विवाद हो रहा है।
मनी बिल के रूप में पेश करने पर विवाद
विवाद जजों की संख्या बढ़ाने पर नहीं है बल्कि, विपक्ष ने इसे अध्यादेश के जरिए लाने, मनी बिल के रूप में पेश करने और केवल चार जज बढ़ाने से न्याय व्यवस्था में कितना बदलाव आएगा, जैसे कई सवाल उठाए। संविधान में मनी बिल सिर्फ उसे माना जाता है, जब मामला टैक्स लगाने या हटाने का हो। सरकारी खजाने से पैसा निकालना हो। कर्ज लेना हो या बजट और अन्य सरकारी खर्च करने हों। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 110 में प्रावधान किए गए हैं। इसमें साफ तौर पर लिखा है कि किसी भी विधेयक को मनी बिल तभी माना जाएगा जब वह वित्तीय मामलों से जुड़ा हो, राजस्व या सरकारी धन से संबंधित हो।
क्या है विपक्ष का सवाल?
वहीं, सरकार का कहना है कि चार नए जज आएंगे तो वेतन, स्टाफ, घर, सुरक्षा और अनय सुविधाओं पर सरकारी पैसा खर्च होगा। इसीलिए ये वित्तीय प्रभाव वाला कानून है, इसीलिए इसे मनी बिल के तौर पर पेश किया गया, जबकि वपिक्षी नेताओं का कहना है कि इस विधेयक का उद्देश्य पैसा खर्च करना नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाना है। विपक्ष का कहना है कि खर्च तो लगभग हन कानून के साथ जुड़ा होता है, लेकिन सिर्फ पैसा खर्च होने से कोई विधेयक मनी बिल कैसे बन सकता है। विपक्ष का कहना है कि सरकार हर कानून को मनी बिल बताकर राज्यसभा की भूमिका को कम करना चाहती है।
विवाद की वजह है बिल की ताकत
इस पर विवाद की वजह है बिल की सबसे बड़ी ताकत। दरअसल कोई भी मनी बिल सिर्फ लोकसभा में पेश किया जाता है। अगर लोकसभा से ये बिल पास हो जाता है तो राज्यसभा इस पर न तो आपत्ति कर सकती है न ही इसमें संशोधन कर सकती है और न ही रोक सकती है। उच्च सदन के पास सिर्फ सुझाव देने का अधिकार होता है, अंतिम फैसला लोकसभा का ही माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक क्या है?
यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 1956 में संशोधन करता है। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी जाएगी। यानी अब सुप्रीम कोर्ट में कुल 38 जज (1 मुख्य न्यायाधीश + 37 अन्य न्यायाधीश) होंगे। सरकार का कहना है कि इससे अधिक बेंचें बनाई जा सकेंगी और मामलों की सुनवाई तेजी से हो सकेगी।
सरकार को इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
सरकार ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में 92,101 मामले लंबित थे। वर्ष 2025 में 75,410 नए मामले दर्ज हुए। जबकि केवल 65,615 मामलों का निपटारा हो सका। यानी हर साल जितने मामले निपटाए जा रहे हैं, उससे ज्यादा नए मामले अदालत में पहुंच रहे हैं। सरकार का कहना है कि इससे पुराने मामलों और संविधान पीठ के मामलों की सुनवाई प्रभावित हो रही है। इसलिए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना जरूरी हो गया था।
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