लखनऊ। लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट की क्राइम ब्रांच ने अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी करने वाले फर्जी कॉल सेंटरों की तकनीकी कार्यप्रणाली (Technical Modus Operandi) का खुलासा किया है। डिजिटल फॉरेंसिक जांच में सामने आया है कि आरोपी पारंपरिक टेलीफोन नेटवर्क के बजाय इंटरनेट आधारित VoIP (Voice over Internet Protocol) तकनीक का इस्तेमाल कर अमेरिका (USA) के नागरिकों को निशाना बनाते थे। जांच में कॉलिंग नेटवर्क, सॉफ्टवेयर, सर्वर और विदेशी संचालकों की भूमिका से जुड़े कई अहम तकनीकी साक्ष्य मिले हैं।
क्राइम ब्रांच ने 1 जुलाई और 18 जुलाई 2026 को कार्रवाई करते हुए संगठित साइबर गिरोह का भंडाफोड़ किया था। इस दौरान बड़ी संख्या में कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन, नेटवर्किंग उपकरण और अन्य डिजिटल साक्ष्य बरामद किए गए थे। मामले में थाना साइबर क्राइम लखनऊ में दो अलग-अलग मुकदमे दर्ज कर विवेचना की जा रही है।
VoIP तकनीक से करते थे अंतरराष्ट्रीय कॉल
जांच में पता चला कि आरोपी सामान्य अंतरराष्ट्रीय टेलीफोन प्रणाली (PSTN) का उपयोग नहीं करते थे। इसके बजाय इंटरनेट आधारित VoIP Infrastructure के जरिए विदेशी नागरिकों से संपर्क स्थापित किया जाता था। इस तकनीक में कॉल इंटरनेट नेटवर्क के माध्यम से होती है, जिससे दुनिया के किसी भी देश में आसानी से कॉल की जा सकती है।
SIP आधारित नेटवर्क पर चलता था पूरा सिस्टम
डिजिटल फॉरेंसिक जांच में यह भी सामने आया कि पूरा कॉलिंग सिस्टम Session Initiation Protocol (SIP) पर आधारित था। SIP एक तकनीकी प्रोटोकॉल है, जिसके माध्यम से इंटरनेट पर वॉयस कॉल शुरू करना, सत्यापित करना, बनाए रखना और समाप्त करना संभव होता है। प्रत्येक कंप्यूटर को SIP Authentication और Server Configuration के माध्यम से VoIP नेटवर्क से जोड़ा जाता था।
EyeBeam और IDIM Dialer का इस्तेमाल
जांच में बरामद कंप्यूटरों से पता चला कि आरोपी EyeBeam/X-Lite Softphone का इस्तेमाल SIP Client के रूप में करते थे। यह सॉफ्टवेयर इंटरनेट के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय कॉल करने में उपयोग किया जाता था।
इसके अलावा IDIM Dialer नामक सॉफ्टवेयर का उपयोग कॉल मैनेजमेंट और कॉलिंग कैंपेन चलाने के लिए किया जा रहा था। इस सॉफ्टवेयर के जरिए ऑपरेटरों को क्रमवार कॉल उपलब्ध कराई जाती थीं और पूरी कॉलिंग गतिविधि नियंत्रित की जाती थी।
विदेश से मिलते थे सर्वर और तकनीकी संसाधन
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि SIP Configuration, Server Details, Calling Credit और अन्य तकनीकी संसाधन विदेश में बैठे संचालकों या उनके सहयोगियों द्वारा उपलब्ध कराए जाते थे। भारत में बैठे ऑपरेटर इन्हीं पूर्व-निर्धारित संसाधनों का उपयोग कर इंटरनेट के माध्यम से अमेरिका के नागरिकों को कॉल करते थे।
ऐसे चलता था पूरा कॉल नेटवर्क
पुलिस के अनुसार कॉलिंग का पूरा तकनीकी प्रवाह इस प्रकार संचालित होता था—
विदेश में बैठे संचालक या स्कैमर
VoIP Infrastructure एवं SIP Server
SIP Authentication एवं Registration
EyeBeam Softphone
IDIM Dialer
इंटरनेट नेटवर्क (IP Network)
संबंधित देश का दूरसंचार नेटवर्क
विदेशी नागरिक तक कॉल
CDR से नहीं मिलती पूरी जानकारी
अपर पुलिस उपायुक्त (अपराध) किरन यादव ने बताया कि इंटरनेट आधारित VoIP कॉलिंग के कारण कई मामलों में पारंपरिक Call Detail Records (CDR) से पूरी जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती। ऐसे मामलों में Digital Forensics, SIP Configuration Analysis, Network Log Examination, IP Address Analysis, System Artifacts, User Activity, E-mail एवं Chat Records की वैज्ञानिक जांच बेहद महत्वपूर्ण होती है।
जारी है फॉरेंसिक जांच
पुलिस ने बताया कि बरामद सभी डिजिटल उपकरणों का विस्तृत फॉरेंसिक परीक्षण कराया जा रहा है। जांच एजेंसियां डिजिटल ट्रेल, इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर, कॉल फ्लो, तकनीकी नेटवर्क और विदेश में बैठे संभावित सहयोगियों की भूमिका की जांच कर रही हैं। आवश्यकता पड़ने पर संबंधित सेवा प्रदाताओं और अन्य राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से भी तकनीकी जानकारी प्राप्त की जा रही है।लखनऊ पुलिस का कहना है कि जांच के आधार पर पूरे अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी नेटवर्क का खुलासा किया जाएगा और इसमें शामिल सभी आरोपियों के खिलाफ विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
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