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प्यार, डर और मौत: एक-दूसरे के पैर बांधकर आग में कूद गए खुशी और अरुण, अधूरी रह गई प्रेम कहानी

फिरोजाबाद। यह कहानी सिर्फ एक प्रेमी युगल की नहीं, बल्कि उस डर, असुरक्षा और भावनात्मक उथल-पुथल की भी है, जिसने दो युवाओं को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया, जिसकी कीमत एक ने अपनी जान देकर चुकाई और दूसरा जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है।

पुलिस दरवाजा तोड़कर अंदर पहुंची

शिकोहाबाद के मोहल्ला पड़ाव लाला की सराय की एक बंद गली में शुक्रवार रात जो हुआ, उसने पूरे इलाके को झकझोर दिया। 18 वर्षीय खुशी शर्मा और 19 वर्षीय अरुण कठेरिया ने एक बंद मकान में अपने पैरों को एक-दूसरे से बांधा और फिर खुद को आग के हवाले कर दिया। जब तक पुलिस दरवाजा तोड़कर अंदर पहुंची, तब तक दोनों बुरी तरह झुलस चुके थे।अस्पताल में उपचार के दौरान खुशी की मौत हो गई, जबकि अरुण जिंदगी के लिए लड़ रहा है।

पिता का साया बचपन में ही उठ गया था

खुशी की जिंदगी बचपन से ही संघर्षों से भरी रही। करीब दस साल पहले एक सड़क हादसे में उसके पिता संजय शर्मा की मौत हो गई थी। पिता के निधन के बाद मां ममता शर्मा ने बेटी खुशी और बेटे हर्ष को पालने की जिम्मेदारी अकेले निभाई।परिवार के लोगों के अनुसार, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के बीच खुशी बड़ी हुई। मां अक्सर बच्चों को लेकर मैनपुरी स्थित मायके आती-जाती थीं। इसी माहौल में खुशी की दुनिया धीरे-धीरे सोशल मीडिया तक पहुंची और वहीं से उसकी जिंदगी ने कई मोड़ लिए।

फेसबुक पर हुई दोस्ती, प्यार में बदली

कुछ महीने पहले फेसबुक पर खुशी की मुलाकात अरुण कठेरिया से हुई। बातचीत शुरू हुई और धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे के करीब आ गए। अरुण नोएडा में काम करता था और 12वीं तक पढ़ा था। दोनों के बीच रिश्ता इतना गहरा हो गया कि एक-दूसरे के बिना जिंदगी की कल्पना करना भी मुश्किल लगने लगा।परिजनों को इस रिश्ते की जानकारी थी या नहीं, यह जांच का विषय है, लेकिन इतना तय है कि दोनों एक-दूसरे के साथ रहना चाहते थे।

पुलिस की दस्तक और मौत का फैसला

शुक्रवार रात पुलिस को दोनों की लोकेशन एक बंद मकान में मिली। पुलिस और परिजन जब वहां पहुंचे तो दोनों को लगा कि अब वे पकड़े जाएंगे।पुलिस सूत्रों के अनुसार, उन्हें यह भय था कि अगर वे पकड़े गए तो उनकी राहें हमेशा के लिए अलग हो जाएंगी। इसी डर ने दोनों को ऐसा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया, जिसे सुनकर हर कोई सन्न है।बताया जाता है कि दोनों रसोईघर में गए, रस्सी से अपने पैर एक-दूसरे से बांध लिए ताकि आखिरी समय में कोई पीछे न हट सके। इसके बाद ज्वलनशील पदार्थ डालकर खुद को आग लगा ली।कुछ ही देर में कमरे से चीखें और आग की लपटें उठने लगीं।

दरवाजा तोड़कर अंदर पहुंची पुलिस

मुख्य गेट लोहे का था और चारों ओर से मकान बंद था। पुलिस ने पहले छतों के रास्ते अंदर जाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद स्थानीय लोगों की मदद से सबल और अन्य औजार मंगाए गए।कड़ी मशक्कत के बाद पुलिस ने प्लाईवुड का दरवाजा तोड़ा और अंदर पहुंची। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।रसोईघर में दोनों गंभीर रूप से झुलसे पड़े थे। पुलिस ने तत्काल उन्हें अस्पताल पहुंचाया, लेकिन खुशी जिंदगी की जंग हार गई।

पीछे छोड़ गई कई सवाल

खुशी की मौत के साथ एक प्रेम कहानी का अंत हो गया, लेकिन कई सवाल पीछे छोड़ गई।क्या दो युवा इतने अकेले और असहाय महसूस कर रहे थे कि उन्हें मौत ही एकमात्र रास्ता नजर आया? क्या समय रहते कोई संवाद, समझाइश या सहारा इस त्रासदी को रोक सकता था? इन सवालों के जवाब शायद जांच में मिलें, लेकिन एक परिवार ने अपनी बेटी खो दी और एक युवक अस्पताल में जिंदगी से जूझ रहा है।

पूरे इलाके में शोक

घटना के बाद मोहल्ले में मातम पसरा हुआ है। जिस घर में कभी बेटी की हंसी गूंजती थी, वहां अब सिर्फ सन्नाटा है। मां ममता शर्मा का रो-रोकर बुरा हाल है। 12 वर्षीय भाई हर्ष अपनी बहन के लौटने का इंतजार कर रहा था, लेकिन उसे उसकी मौत की खबर मिली।यह घटना सिर्फ एक समाचार नहीं, बल्कि एक ऐसी त्रासदी है जो बताती है कि भावनात्मक संकट, सामाजिक दबाव और भविष्य के डर का मिश्रण कितना भयावह परिणाम ला सकता है। खुशी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी अधूरी कहानी लंबे समय तक लोगों को सोचने पर मजबूर करती रहेगी।

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