एसएमयूपीन्यूज, लखनऊ । यूपी के कुशीनगर के परसा गांव में वह घर अब घर नहीं रहा…वह एक ज़िंदा सवाल बन गया है—जिसकी दीवारें चीखती हैं,जिसकी दहलीज खून से सनी है,और जिसके आंगन में अब सन्नाटा पसरा है।जिस घर में मां रूना देवी ने बेटे सिकंदर को जन्म दिया,जिसे गोद में खिलाया,जिसके लिए मन्नतें मांगीं, उसी बेटे ने पत्थर उठाकर मां की ममता और पत्नी के भरोसे—दोनों को कुचल दिया।
घर की दहलीज पर बहनों के नहीं पड़े कदम
हत्या के दूसरे दिन भी उस घर की दहलीज पर बहनों के कदम नहीं पड़े। गांव से गुजरने वाला हर शख्स उस घर की ओर देखता है… और फिर आंखें झुकाकर आगे बढ़ जाता है, मानो वह मंजर आज भी वहां सांस ले रहा हो।मंगलवार को पोस्टमार्टम के बाद मां और बहू के शव गांव नहीं आए।उन्हें सीधे हेतिमपुर घाट ले जाया गया। कोई शहनाई नहीं, कोई विदाई नहीं— बस एक चिता… और उस पर सास और बहू साथ-साथ।
सबके होंठों पर एक ही सवाल— “तीर कौन देगा?
वह प्रियंका,जिसे बचाने की कोशिश में सास रूना देवी बेटे के गुस्से का शिकार हुई, मौत के बाद उसी प्रियंका की चिता पर मां को भी विदा किया गया। घाट पर खड़े हर इंसान की आंख नम थी। सबके होंठों पर एक ही सवाल— “तीर कौन देगा?”प्रियंका के पिता राजेंद्र गुप्ता चिता की ओर देखते रहे… आंसू बहते रहे… और शब्द टूटते चले गए— “तीन दिन पहले बेटी को हंसी-खुशी विदा किया था… सोचा नहीं था कि उसकी अर्थी ऐसे उठेगी, और वह भी उसी आदमी के हाथों जिसे सौंपकर निश्चिंत हो गया था…”
बहनों की हालत ऐसी है कि शव घर लाने की हिम्मत नहीं हुई
सिकंदर के बहनोई आद्या गुप्ता भी फफक पड़े— “हम लोगों के लिए अब सब खत्म हो गया। बहनों की हालत ऐसी है कि शव घर लाने की हिम्मत नहीं हुई।” परसा गांव में मंगलवार की सुबह सिर्फ सन्नाटा लेकर आई। चूल्हे नहीं जले, मजदूर काम पर नहीं गए, और जो बच्चे रोज खेलते थे वे डर और खामोशी में दुबक गए। घर पर ताला लटका है। पांचों बहनें पड़ोसी के यहां रात काट रही हैं। जब ढांढस बंधाने आई महिलाओं में किसी ने सिकंदर का नाम ले लिया, तो बहन चीख उठी— “उस खूनी का नाम मत लो… अब उसका नाम भी जहर जैसा लगता है।”
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने इंसानियत को झकझोर दिया
सोमवार सुबह घरेलू विवाद में 30 वर्षीय सिकंदर ने पत्थर से सिर कूंचकर अपनी पत्नी प्रियंका और मां रूना देवी की हत्या कर दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने इंसानियत को झकझोर दिया। डॉक्टरों के मुताबिक मां के चेहरे और सिर पर इतनी बेरहमी से वार किए गए कि खोपड़ी चकनाचूर हो गई। पत्नी के चेहरे पर भी नफरत की चोटें थीं। यह सिर्फ हत्या नहीं थी— यह रिश्तों का कत्ल था।परसा गांव अब रोज उसी सवाल के साथ जागता है— जिस बेटे के लिए मां ने भगवान से मन्नतें मांगीं, क्या वही बेटा इतना बेरहम हो सकता है? और उस घर की दहलीज आज भी जवाब मांग रही है…
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