अंबेडकरनगर । चार मासूम बच्चों और उनकी मां की निर्मम हत्या करने वाले आमिर का अंत भी उतना ही सिहराने वाला और अकेला रहा, जितना उसका अपराध। एनकाउंटर में ढेर होने के बाद उसकी लाश के साथ जो हुआ, उसने इंसानियत, रिश्तों और समाज—तीनों को आईना दिखा दिया।मीरानपुर के कसाईबाड़ा का रहने वाला आमिर… जिसने अपने ही हाथों से चार मासूम जिंदगियां बुझा दीं, मौत के बाद खुद भी ऐसी खामोशी में दफन हुआ, जहां न कोई अपना था, न कोई रोने वाला।
अपनों ने ही ठुकराया, रिश्तों ने तोड़ लिया नाता
पोस्टमार्टम के बाद जब शव परिजनों को सौंपा गया, तो एक चौंकाने वाला सच सामने आया—उसके अपने ही उसे लेने को तैयार नहीं थे। पिता पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे। मां, तीन भाई और बहनें होने के बावजूद किसी ने उसे अपनाने से इनकार कर दिया।भाई सैफी, चाचा ताज मोहम्मद और अन्य परिजनों ने साफ शब्दों में कह दिया—“हम इस कलंक को अपने साथ नहीं जोड़ सकते।”उसके गुनाह इतने भारी थे कि खून के रिश्ते भी शर्म से झुक गए। मोहल्ले में भी गुस्सा इतना था कि अगर कोई उसके अंतिम संस्कार में शामिल होता, तो सामाजिक बहिष्कार तक की चेतावनी दी जा रही थी।
समाज का कठोर फैसला, मौत के बाद भी सजा
यह सिर्फ एक अपराधी का अंत नहीं था… यह समाज का एक सख्त फैसला भी था। जहां इंसान को उसके गुनाहों के साथ तौला गया और उसे मरने के बाद भी इज्जत की दो गज जमीन तक नसीब नहीं हुई।काफी समझाने के बाद परिजन शव लेने को तो राजी हुए, लेकिन उसे घर तक लाना भी मंजूर नहीं किया। जैसे आमिर पहले ही उनके दिलों से दफन हो चुका था।
कब्रिस्तान ने भी ठुकराया, घाट पर हुई गुमनाम दफन
शव को पोस्टमार्टम हाउस से सीधे शहजादपुर के इमामबाग कब्रिस्तान ले जाया गया… लेकिन वहां भी उसे जगह नहीं मिली। मानो जमीन का एक टुकड़ा भी उसके गुनाहों का बोझ उठाने को तैयार न हो।आखिरकार पुलिस की मौजूदगी में जौहरडीह शिवाला घाट पर उसे दफनाया गया—
बिना किसी रस्म के…
बिना किसी दुआ-फातिहा के…
और बिना किसी आखिरी विदाई के…
एक डरावनी सीख छोड़ गया आमिर
स्थानीय लोगों का कहना है—“कुछ गुनाह सिर्फ जिंदगी ही नहीं छीनते, बल्कि मौत के बाद मिलने वाली इज्जत भी खत्म कर देते हैं।”आमिर की कहानी अब एक ऐसी मिसाल बन गई है, जो बताती है कि इंसान अपने कर्मों से न सिर्फ दुनिया, बल्कि मौत के बाद की पहचान भी खो देता है।
