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स्मार्ट प्रीपेड मीटर पर घमासान: निजी कंपनियों की कार्यप्रणाली पर सवाल, निजीकरण वापस लेने की मांग तेज

लखनऊ । उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर व्यवस्था को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। अरविंद कुमार शर्मा द्वारा निजी कंपनियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जाने के बाद बिजली कर्मचारियों के संगठन ने निजीकरण के फैसले पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में लागू की जा रही स्मार्ट प्रीपेड मीटर प्रणाली उपभोक्ताओं के लिए राहत के बजाय परेशानी का कारण बनती जा रही है। उपभोक्ताओं को बार-बार बिजली कटौती, रिचार्ज संबंधी दिक्कतों और अनिश्चित आपूर्ति जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

निजी कंपनियां उपभोक्ता सेवा देने में विफल रही

समिति ने कहा कि ऊर्जा मंत्री के निर्देश इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि मीटरिंग कार्य देख रही निजी कंपनियां उपभोक्ता सेवा देने में विफल रही हैं और उनका ध्यान केवल मुनाफा कमाने पर केंद्रित है। बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता और उपभोक्ता संतुष्टि पूरी तरह प्रभावित हुई है।संघर्ष समिति के अनुसार, स्मार्ट मीटरिंग व्यवस्था में खामियों के कारण आम जनता में आक्रोश बढ़ रहा है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि बिजली कब आएगी और कब जाएगी, इसकी कोई निश्चितता नहीं है। इस अव्यवस्था का खामियाजा बिजली कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें उपभोक्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

बिजली व्यवस्था निजी हाथों में सौंपना एक गंभीर जोखिम होगा

समिति ने विशेष रूप से GMR Group सहित अन्य निजी कंपनियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब ये कंपनियां मीटरिंग जैसे सीमित कार्य को भी सही ढंग से नहीं संभाल पा रही हैं, तो पूरे प्रदेश की बिजली व्यवस्था निजी हाथों में सौंपना एक गंभीर जोखिम होगा।बयान में चेतावनी दी गई कि यदि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के अंतर्गत आने वाले 42 जिलों की बिजली व्यवस्था निजी क्षेत्र को सौंप दी गई, तो हालात और भी बिगड़ सकते हैं। इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में गरीब और ग्रामीण उपभोक्ता रहते हैं, जिनकी जरूरतों को समझना और संवेदनशीलता के साथ सेवा देना जरूरी है।

निजीकरण का निर्णय तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए

संघर्ष समिति ने मांग की है कि उपभोक्ताओं के हित में इन वितरण निगमों के निजीकरण का निर्णय तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए। साथ ही, आंदोलन के दौरान बिजली कर्मचारियों पर की गई सभी कार्रवाईयों को भी समाप्त करने की मांग की गई है, ताकि कर्मचारी निर्बाध रूप से बिजली आपूर्ति सुनिश्चित कर सकें।समिति ने यह भी दावा किया कि आंदोलन के दौरान भी बिजली कर्मियों ने उपभोक्ताओं और किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और बिजली व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने में कोई कमी नहीं आने दी।अंत में संघर्ष समिति ने चेतावनी दी कि स्मार्ट मीटर व्यवस्था में अव्यवस्था और आउटसोर्स कर्मियों की छंटनी से प्रदेश की बिजली व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी पावर कॉर्पोरेशन प्रबंधन की होगी।

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