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मीरजापुर लोस : ”स्वघोषित” अभी से ही जीत सुनिश्चित होने का भरने लगे हैं दंभ

मीरजापुर। राज्य के अति पिछड़ा मिरजापुर जिले में लोकसभा चुनाव की डुगडुगी बज चुकी है, सिर्फ और सिर्फ अधिकारिक तौर पर घोषणा होनी बाकी है। भाजपा-अपना दल (एस) गठबंधन से उम्मीदवार कौन है? यह भी सर्वविदित है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस-सपा और बसपा में अभी खामोशी देखी जा रही है। सपा ने अपनी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को पिछले महीने ही यहां से प्रभारी घोषित कर मैदान में उतारा है, जो एक दो कार्यक्रमों के बाद थके हारे हुए यहां से विलुप्त हो लिए हैं।

टिकट को लेकर अभी सिर्फ चल रही कयासबाजी

टिकट किसको मिलेगा, कौन दमदारी से सत्ता से ‘रण संघर्ष’ करते हुए यहां (मीरजापुर लोस) की रहनुमाई करने में सफलता प्राप्त कर सकता है? इसको लेकर कयासबाजी जोरों पर है। सभी खासकर पार्टी संगठन के अंदरखाने में चर्चा तेज है, लेकिन दबी जुबान, भय इस बात का भी है कि नेता जी ‘पार्टी प्रमुख’ के समक्ष मुंह कौन खोले? एक बात और वह कहावत है ना कि “राजा को पता नहीं भील वन बांट आएं” की तर्ज पर इधर बीच एक ‘स्वघोषित’ समाजसेविका व खुद को सपा की महिला नेत्री कहनें वाली मोहतरमा जरूर पार्टी में अपने को दमदार उम्मीदवार ही नहीं मौजूदा सांसद को हराकर जीत का स्वयं दंभ भरने से पीछे नहीं हैं वह भी बैठे बिठाए। जिनके बारे में पूछे जाने पर कई कार्यकर्ता खुद मुंह बिदका कर चलते बनते हैं।

उम्मीदवारों के नामाें को लेकर मंथन तेज

बहरहाल, लोकसभा चुनाव लड़ने की आतुरता भी देखी जा रही है। हर कोई उतावला बना हुआ है। खासकर चुनाव लड़ने के लिए मन बनाये हुए लोग तो अपने ‘आका’ के गणेश परिक्रमा करने में भी जुट गए हैं। इनमें कुछ ऐसे भी चेहरे हैं जिनको खुद उनकी ही पार्टी के लोग नहीं जानते पहचानते हैं, लेकिन वह भी उछल-कूद मचाने से पीछे नहीं हैं। भला हो कुछ तथाकथित सोशल मीडिया के लोगों का जो उन्हें जिंदा बनाये रखने के लिए कभी सशक्त तो मुकाबले में मजबूत दावेदार ‘स्वघोषित’ करते हुए अभी से ही जीत सुनिश्चित होने का दंभ भर दें रहें हैं।

अब यह अलग बात है कि पार्टी हाईकमान ने भले ही कोई हां-ना अभी नहीं किया है। उम्मीदवारों के नामों पर मंथन जारी है। कौन किसको कितना टक्कर दे सकता है इसके आधार पर भी कयासों का दौर जारी है। तो वहीं दूसरी ओर मतदाता भी सरकार की चलाई गई योजनाओं पर अपना ‘छाती’ पीटने वाले जनप्रतिनिधि को सबक सिखाने के मूड़ में है जो चुनाव सिर पर होने पर ‘विकासवादी विचारों’ का ‘घोल’ पिलाते फिरने लगे हैं

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