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298 वोट… फिर भी फेल! महिला आरक्षण बिल क्यों नहीं बन पाया कानून—पूरी कहानी समझिए

नई दिल्ली। संसद के भीतर शुक्रवार का दिन खास था। देश की आधी आबादी को राजनीतिक हिस्सेदारी देने वाला बहुप्रतीक्षित संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026 जब लोकसभा में मतदान के लिए आया, तो माहौल पूरी तरह गर्म था। सत्ता पक्ष को भरोसा था कि यह ऐतिहासिक बिल पास हो जाएगा, लेकिन नतीजा उम्मीदों के उलट निकला।

पहली नजर में लगा कि बिल आसानी से पास हो गया

मतदान हुआ… गिनती शुरू हुई… और आंकड़े सामने आए—पक्ष में 298 वोट, विरोध में 230 वोट।पहली नजर में लगा कि बिल आसानी से पास हो गया होगा। लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है।

जहां जीत दिख रही थी, वहीं हार छिपी थी

दरअसल, यह कोई साधारण विधेयक नहीं, बल्कि संविधान संशोधन बिल था। ऐसे में इसे पास कराने के लिए साधारण बहुमत नहीं, बल्कि दो-तिहाई बहुमत जरूरी था। सदन में उस समय 528 सांसद मौजूद थे, यानी बिल पास कराने के लिए कम से कम 352 वोट चाहिए थे।लेकिन सरकार 298 वोट ही जुटा सकी— यानी 54 वोट कम पड़ गए और यही वजह बनी कि ज्यादा समर्थन मिलने के बावजूद बिल पास नहीं हो पाया।

12 साल बाद बड़ा झटका

यह नतीजा इसलिए भी चौंकाने वाला रहा क्योंकि पिछले 12 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ जब केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार का कोई संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में गिर गया।

सत्ता बनाम विपक्ष—सीधे आरोप

मतदान के बाद सियासत भी तेज हो गई।संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इसे “दुर्भाग्यपूर्ण” बताते हुए विपक्ष पर निशाना साधा। उनका कहना था कि महिलाओं को अधिकार देने का ऐतिहासिक मौका विपक्ष ने गंवा दिया।

वहीं विपक्ष का तर्क कुछ और था…

असली टकराव—परिसीमन पर

इस बिल के साथ एक बड़ा मुद्दा जुड़ा था—परिसीमन (Delimitation)।

सरकार चाहती थी कि नई जनगणना के बाद सीटों का पुनर्निर्धारण हो और उसी आधार पर महिलाओं को 33% आरक्षण दिया जाए।लेकिन विपक्ष को डर था कि— इससे कुछ राज्यों को ज्यादा सीटें मिलेंगी और कुछ राज्यों का राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है । यही मुद्दा दोनों पक्षों के बीच सबसे बड़ा विवाद बन गया।

बिल में क्या था खास?

इस विधेयक में—
लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 तक करने का प्रस्ताव
2029 के आम चुनाव से पहले महिलाओं को 33% आरक्षण
राज्यों की विधानसभाओं में भी आरक्षण लागू करने की योजना
यानी यह बिल सिर्फ आरक्षण ही नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक ढांचे में बड़ा बदलाव लाने वाला था।

बाकी बिल भी अटक गए

इस मुख्य बिल के साथ पेश किए गए—
परिसीमन विधेयक, 2026
संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026
ये भी आगे नहीं बढ़ पाए, क्योंकि इनकी किस्मत महिला आरक्षण बिल से जुड़ी थी।

अब आगे क्या?

अब गेंद फिर से सरकार के पाले में है।
क्या बिल संशोधित होकर दोबारा आएगा?
क्या विपक्ष से सहमति बन पाएगी?
या यह मुद्दा फिर लंबी राजनीतिक बहस में उलझ जाएगा?
फिलहाल इतना तय है कि महिला आरक्षण का सवाल अभी खत्म नहीं हुआ, बल्कि अब यह और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।

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