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2014 के भर्ती घोटाले में बड़ा एक्शन! पूर्व प्रमुख सचिव योगेश कुमार गिरफ्तार, 1,198 पदों की चयन प्रक्रिया पर उठे थे सवाल

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ईओडब्ल्यू ने लखनऊ के गोमती नगर से 1980 बैच के सेवानिवृत्त आईएएस को पकड़ा; ओएमआर शीट में कथित छेड़छाड़ से लेकर मेरिट सूची तक अनियमितताओं के आरोप, 28 अभियुक्तों में 25 के खिलाफ पहले ही दाखिल हो चुके हैं आरोपपत्र

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती घोटाले में आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन (ईओडब्ल्यू) ने बड़ी कार्रवाई की है। वर्ष 2014 में हुई भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के मामले में तत्कालीन प्रमुख सचिव और 1980 बैच के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी योगेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया है। ईओडब्ल्यू की टीम ने बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को उन्हें लखनऊ के गोमती नगर से गिरफ्तार किया। भर्ती के समय योगेश कुमार पशुपालन विभाग में प्रमुख सचिव के पद पर तैनात थे।

इस मामले में 1,198 पदों पर चयन होना था, लेकिन भर्ती प्रक्रिया के दौरान नियमों के पालन, ओएमआर शीट के मूल्यांकन और मेरिट सूची तैयार करने के तरीके पर गंभीर सवाल उठे थे। जांच में मंडलीय चयन समितियों के अधिकारों के विपरीत केंद्रीकृत मूल्यांकन कराए जाने और पात्र अभ्यर्थियों को नुकसान पहुंचाने तथा अपात्र अभ्यर्थियों को लाभ देने के आरोप सामने आए। लंबे समय से चल रहे इस मामले में पूर्व प्रमुख सचिव की गिरफ्तारी को जांच की महत्वपूर्ण कार्रवाई माना जा रहा है।

1,198 पद, 17 मंडल और 2 फरवरी 2014 की परीक्षा

पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती के लिए शासन ने प्रदेश के 17 मंडलों में 1,198 रिक्त पदों पर नियुक्ति की स्वीकृति दी थी। सहारनपुर मंडल को इस भर्ती से अलग रखा गया था। चयन के लिए 2 फरवरी 2014 को लिखित परीक्षा आयोजित की गई थी।

भर्ती प्रक्रिया उत्तर प्रदेश पशुधन प्रसार एवं कुक्कुट विकास सेवा नियमावली-2002 और वर्ष 2013 में संशोधित नियमावली के प्रावधानों के तहत पूरी की जानी थी। आरोप है कि चयन प्रक्रिया में इन नियमों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। ओएमआर शीट के मूल्यांकन और मेरिट सूची तैयार करने में कथित अनियमितताओं के चलते भर्ती की निष्पक्षता पर सवाल उठे।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकारी भर्ती में चयनित अभ्यर्थियों का भविष्य परीक्षा में मिले अंकों और मेरिट सूची पर निर्भर करता है। ऐसे में यदि मूल्यांकन प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई हो, तो उसका असर योग्य अभ्यर्थियों के अवसरों पर पड़ सकता है।

मंडलीय चयन समितियों के अधिकारों के विपरीत हुआ केंद्रीकृत मूल्यांकन

जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के मुताबिक, मंडलीय चयन समितियों के अधिकारों के विपरीत ओएमआर शीट का केंद्रीकृत मूल्यांकन कराने के लिए फिरोज गांधी इंस्टीट्यूट, रायबरेली को नामित किया गया था।

आरोप है कि भर्ती नियमों के विपरीत निर्णय लेकर ओएमआर शीट में छेड़छाड़ की गई, जिससे पात्र अभ्यर्थियों को नुकसान और अपात्र अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाया गया। ओएमआर शीट के मूल्यांकन और मेरिट सूची तैयार करने की प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं इस मामले की जांच का प्रमुख आधार बनीं।

हालांकि, इन आरोपों के संबंध में अंतिम कानूनी निष्कर्ष अदालत में साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर तय होंगे। योगेश कुमार की गिरफ्तारी को दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।

2017 में एसआईटी को सौंपी गई जांच, 2019 में दर्ज हुआ मुकदमा

भर्ती में अनियमितताओं की शिकायतों के बाद शासन ने वर्ष 2017 में मामले की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपी थी। जांच के बाद वर्ष 2019 में एसआईटी थाने में मुकदमा संख्या 01/2019 दर्ज किया गया।

मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 420, 467, 468, 471, 120बी और 201 के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। इन धाराओं में आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, कूटरचना, जाली दस्तावेजों के इस्तेमाल, आपराधिक साजिश, साक्ष्य मिटाने और भ्रष्टाचार से संबंधित आरोप शामिल हैं।

जांच एजेंसी के विवरण के अनुसार, मामले में छह नामजद और विवेचना के दौरान सामने आए 22 अन्य अभियुक्तों सहित कुल 28 अभियुक्त हैं। इनमें से 25 अभियुक्तों के खिलाफ अलग-अलग तिथियों पर पहले ही आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं। योगेश कुमार की गिरफ्तारी इसी लंबे समय से चल रही जांच के बीच हुई है।

भर्ती के समय प्रमुख सचिव थे योगेश कुमार

योगेश कुमार भर्ती प्रक्रिया के दौरान पशुपालन विभाग में प्रमुख सचिव के पद पर कार्यरत थे। अब सेवानिवृत्त हो चुके इस आईएएस अधिकारी की भूमिका को लेकर जांच की गई। ईओडब्ल्यू की कार्रवाई इसी मामले में उनकी कथित भूमिका से संबंधित है।

वर्षों पुराने मामले में उनकी गिरफ्तारी से भर्ती प्रक्रिया में लिए गए प्रशासनिक निर्णयों और चयन व्यवस्था की भूमिका फिर चर्चा में आ गई है। जांच का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि कथित अनियमितताओं में किसकी क्या भूमिका थी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किन लोगों की कानूनी जिम्मेदारी बनती है।

तत्कालीन मंत्री राजकिशोर सिंह की भूमिका भी चर्चा में

भर्ती के समय प्रदेश सरकार में राजकिशोर सिंह पशुधन विकास मंत्री थे। इस मामले में उनकी भूमिका को लेकर भी पहले सवाल उठे हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, तत्कालीन मंत्री के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति से संबंधित फाइल शासन स्तर पर लंबित बताई गई है। इस संबंध में आगे की कार्रवाई का निर्णय संबंधित स्वीकृति और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति का नाम जांच में सामने आना या अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया में होना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी का निर्धारण साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

अब आगे क्या?

ईओडब्ल्यू की कार्रवाई के बाद अब मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। जांच से जुड़े साक्ष्य, भर्ती के दौरान लिए गए निर्णय, ओएमआर शीट के मूल्यांकन की व्यवस्था और मेरिट सूची तैयार करने की प्रक्रिया जैसे पहलू इस मामले में अहम बने रहेंगे।

करीब 12 वर्ष पुरानी भर्ती प्रक्रिया से जुड़े इस प्रकरण ने सरकारी चयन व्यवस्था में पारदर्शिता, नियमों के पालन और जवाबदेही की जरूरत को फिर सामने ला दिया है। 1,198 पदों की भर्ती से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच और अदालत में साक्ष्यों की कसौटी पर उनका परीक्षण ही यह तय करेगा कि कथित अनियमितताओं के लिए कौन जिम्मेदार था।फिलहाल इस मामले में सबसे बड़ा घटनाक्रम तत्कालीन प्रमुख सचिव योगेश कुमार की गिरफ्तारी है। अब सभी की नजरें आगे की कानूनी कार्रवाई और मामले से जुड़े अन्य पहलुओं पर टिकी हैं।

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