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नीरजा भनोट से कैप्टन स्मित तक, विमान में संकट के बीच दो भारतीयों की साहसगाथा

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करीब चार दशक के अंतराल में अलग-अलग हालात में यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाली दो मिसालें, नीरजा ने जान देकर बचाईं जिंदगियां तो स्मित ने घायल होने के बावजूद निभाया कर्तव्य

नई दिल्ली। विमान में सफर कर रहे सैकड़ों यात्रियों के लिए आसमान में अचानक पैदा होने वाला संकट किसी भयावह स्थिति से कम नहीं होता। ऐसे समय में चालक दल का हर फैसला बेहद अहम हो जाता है। भारत के इतिहास में दो ऐसी घटनाएं दर्ज हैं, जिनमें विमान के भीतर पैदा हुए संकट के दौरान भारतीयों ने दूसरों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। इनमें एक नाम 1986 की नीरजा भनोट का है तो दूसरा 2026 के कैप्टन स्मित मच्छार का।

दोनों घटनाओं के बीच करीब चार दशक का अंतर है। परिस्थितियां भी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थीं, लेकिन दोनों मामलों में यात्रियों की सुरक्षा और कर्तव्य को प्राथमिकता देने का पहलू सामने आया।

1986 में नीरजा भनोट ने दिखाई बहादुरी

5 सितंबर 1986 को पैन एम की फ्लाइट 73 कराची हवाईअड्डे पर आतंकवादियों ने हाईजैक कर ली थी। विमान में बड़ी संख्या में यात्री सवार थे और स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही थी। उस समय विमान की वरिष्ठ फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट यात्रियों की सुरक्षा के लिए आगे आईं।

कॉकपिट का चालक दल विमान से निकलने में सफल रहा था। इसके बाद यात्रियों की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी नीरजा और उनके सहयोगियों पर आ गई। आतंकवादियों ने यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा करने को कहा। नीरजा ने पासपोर्ट एकत्र किए, लेकिन अमेरिकी नागरिकों की पहचान छिपाने के लिए कई पासपोर्ट अलग कर दिए।

गोलीबारी के बीच यात्रियों को निकाला

हालात बिगड़ने के बाद विमान के अंदर गोलीबारी शुरू हो गई। नीरजा ने यात्रियों को आपातकालीन निकास की तरफ जाने में मदद की। उन्होंने बच्चों और अन्य यात्रियों को बचाने की कोशिश की।

इसी दौरान वह आतंकवादियों की गोली का शिकार हो गईं और उनकी मौत हो गई। यात्रियों की जान बचाने के लिए किए गए उनके प्रयासों के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। पाकिस्तान ने भी उनके मानवीय साहस को सम्मान देते हुए उन्हें मरणोपरांत ‘तमगा-ए-इंसानियत’ से नवाजा।

चार दशक बाद कैप्टन स्मित की कहानी

करीब 40 साल बाद विमानन जगत में एक और घटना ने भारतीय पायलट के साहस को चर्चा में ला दिया। 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान के दौरान कॉकपिट में गंभीर हिंसक घटना हुई।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर उनके साथी पायलट ने कथित तौर पर चाकू से हमला किया। इस हमले में स्मित गंभीर रूप से घायल हुए। इसके बावजूद उन्होंने विमान और उसमें सवार यात्रियों की सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई।

घटना के दौरान यात्रियों की मदद से स्थिति को संभाला गया। इसके बाद विमान का मार्ग बदला गया और उसे सऊदी अरब के तबुक में सुरक्षित उतारा गया। कैप्टन स्मित को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी स्थिति स्थिर बताई गई।

परिस्थितियां अलग, कर्तव्य एक

नीरजा भनोट और कैप्टन स्मित मच्छार की घटनाओं में लगभग चार दशक का अंतर है। नीरजा के सामने हथियारबंद आतंकवादी थे, जबकि स्मित के मामले में कथित तौर पर हमला उनके साथी पायलट की ओर से हुआ।

दोनों घटनाओं की परिस्थितियां अलग होने के बावजूद एक समान पहलू सामने आता है—संकट के समय यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना। नीरजा ने यात्रियों को बचाने की कोशिश में अपनी जान गंवाई, जबकि स्मित गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी विमान में मौजूद लोगों की सुरक्षा में भूमिका निभाते हुए सुरक्षित लैंडिंग तक पहुंचे।

युद्ध का मैदान नहीं, विमान के भीतर दिखा साहस

इन दोनों घटनाओं की खासियत यह भी है कि बहादुरी किसी युद्ध के मैदान में नहीं दिखाई गई। हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ते विमान के भीतर सीमित समय और बेहद तनावपूर्ण परिस्थितियों में लिए गए फैसलों ने इन दोनों घटनाओं को यादगार बनाया।

नीरजा की कहानी बलिदान और मानवीय साहस की मिसाल बनी, जबकि कैप्टन स्मित की घटना में गंभीर खतरे के बीच कर्तव्य निभाने की बात सामने आई। करीब चार दशक के अंतराल में सामने आईं ये दोनों घटनाएं विमानन क्षेत्र में संकट के समय चालक दल की जिम्मेदारी और मानवीय साहस की चर्चा को फिर सामने लाती हैं।

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