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जौनपुर और वाराणसी के प्रतिनिधियों ने सवर्ण आर्मी अध्यक्ष सूरज चौबे से की मुलाकात, आरक्षण व्यवस्था और सपा प्रमुख के बयान पर घेरा

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लखनऊ। सवर्ण आर्मी भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरज प्रसाद चौबे के आवास पर सोमवार को सवर्ण समाज और पिछड़ा समाज (जिला जौनपुर व वाराणसी) के प्रतिनिधियों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई। बैठक में पहुंचे सभी प्रतिनिधियों का राष्ट्रीय अध्यक्ष ने माल्यार्पण कर भावभिना स्वागत व अभिनंदन किया।

‘आवाज को दबा नहीं सकती सरकार’

बैठक को संबोधित करते हुए सूरज प्रसाद चौबे ने वाराणसी में जारी आंदोलन का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वाराणसी में शांतिपूर्ण तरीके से भूख हड़ताल पर बैठे उनके साथियों को पुलिस ने बलपूर्वक डिटेन कर अस्पताल पहुंचा दिया है। चौबे ने कड़े शब्दों में कहा, “पुलिस हमारे साथियों को डिटेन कर सकती है, लेकिन हमारी आवाज को डिटेन नहीं किया जा सकता। सरकार को हमारी जायज मांगों पर बात करनी ही पड़ेगी। जब तक व्यवस्था में सुधार और बदलाव नहीं हो जाता, हम रुकने वाले नहीं हैं और लगातार अपनी आवाज उठाते रहेंगे।”

‘आरक्षण का आधार जन्म नहीं, आर्थिक पिछड़ापन हो’

आरक्षण व्यवस्था पर बड़ा बयान देते हुए सवर्ण आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि आरक्षण का सवाल केवल आज की नौकरियों या कॉलेज की सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा विषय है। यदि अवसरों का आधार योग्यता और प्रदर्शन से हटकर केवल पहचान या जाति बनता गया, तो इससे देश की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि गरीब चाहे किसी भी वर्ग का हो, उसे शिक्षा और उन्नति के पूरे अवसर मिलने चाहिए, लेकिन सरकारी सहायता व आरक्षण का आधार जन्म के बजाय केवल ‘आर्थिक और वास्तविक पिछड़ापन’ होना चाहिए। देश में ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जो कमजोर को ऊपर उठाए, लेकिन योग्य उम्मीदवार को नीचे न धकेले। जब योग्यता को हतोत्साहित किया जाता है, तो नुकसान किसी एक वर्ग का नहीं बल्कि पूरे देश का होता है।

अखिलेश यादव के बयान की तीखी निंदा

कार्यक्रम के दौरान सूरज चौबे ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा हाल ही में एक पत्रकार वार्ता में मनुस्मृति को लेकर दिए गए बयान की कड़े शब्दों में निंदा की। उन्होंने कहा कि मनुस्मृति एक सामाजिक संतुलन, समानता, सम्मान और सुरक्षा व्यवस्था बनाने का नाम है। इसके विपरीत, कुछ नेताओं ने सामाजिक असंतुलन बढ़ाने का काम किया है।

इसके साथ ही उन्होंने पत्रकारों का समर्थन करते हुए कहा कि पत्रकार की कोई जाति नहीं होती, उसकी असली पहचान उसकी जाति से नहीं बल्कि उसकी निष्पक्ष लेखनी से होती है। इस दौरान उपस्थित कार्यकर्ताओं ने सामान्य वर्ग के हितों की रक्षा और योग्य युवाओं को न्याय दिलाने का संकल्प दोहराया।

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