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ग्राहक बनकर वेश्यालय जाने पर नहीं चलेगा केस, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को दी राहत

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अदालत ने कहा- केवल यौन सेवा के लिए भुगतान करना वेश्यावृत्ति के व्यावसायिक शोषण में शामिल होना नहीं, आरोपी के खिलाफ चार्जशीट और समन आदेश रद्द

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी वेश्यालय में ग्राहक के रूप में जाने और व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए यौन सेवा के बदले पैसे देने मात्र से व्यक्ति के खिलाफ अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 की कुछ धाराओं के तहत आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ग्राहक की भूमिका और वेश्यालय के संचालन अथवा वेश्यावृत्ति के व्यावसायिक शोषण में शामिल व्यक्ति की भूमिका अलग-अलग है।

जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी ने नितिन नामक आरोपी की याचिका पर सुनवाई करते हुए उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही, आरोपपत्र और समन आदेश को रद्द कर दिया। मामला गाजियाबाद के भोजपुरा चौराहे के पास स्थित एक मकान में पुलिस की छापेमारी से जुड़ा था।

छापेमारी में 16 लोग पकड़े गए थे

पुलिस को सूचना मिली थी कि डीएलएफ पुलिस चौकी के पास एक मकान में देह व्यापार संचालित किया जा रहा है। सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने मकान में छापेमारी की। कार्रवाई के दौरान कुल 16 लोगों को पकड़ा गया, जिनमें महिलाएं और सात पुरुष शामिल थे।

पुलिस के मुताबिक, मौके पर मौजूद महिलाओं ने पूछताछ में बताया था कि वे देह व्यापार में शामिल थीं और अपनी कमाई का एक हिस्सा मकान में मौजूद उस व्यक्ति को देती थीं, जिसके यहां यह गतिविधि चल रही थी। इसके बाद पुलिस ने उसी दिन एफआईआर दर्ज की और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया।

आरोपी ने हाईकोर्ट में दी चुनौती

मामले में आरोपी नितिन ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया। उसने अपने खिलाफ दाखिल आरोपपत्र, समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की।

याचिका में दलील दी गई कि पुलिस की कार्रवाई में अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 15(2) में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसके अलावा आरोपी की ओर से कहा गया कि उपलब्ध तथ्यों को सही मान भी लिया जाए तो उसकी भूमिका केवल ग्राहक की थी। वह न तो वेश्यालय का संचालन कर रहा था और न ही उसके प्रबंधन या किसी व्यावसायिक गतिविधि में शामिल था।

पुराने फैसले का भी दिया गया हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट के पुराने फैसले दिनेश तिवारी उर्फ धीरेंद्र कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला दिया गया। इस फैसले में भी ग्राहक और वेश्यालय संचालक की भूमिका के बीच अंतर पर विचार किया गया था।

वहीं, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी उस मकान में पुलिस की छापेमारी के दौरान पकड़ा गया था, जहां कथित तौर पर वेश्यावृत्ति संचालित की जा रही थी। सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि आरोपी ने पैसे देकर यौन सेवा ली थी।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद क्या कहा?

अदालत ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा की। हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ ऐसी सामग्री नहीं है, जिससे यह साबित हो कि वह वेश्यालय चलाने, उसके प्रबंधन या वेश्यावृत्ति के व्यावसायिक शोषण में किसी तरह शामिल था।

अदालत ने माना कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आरोपी की भूमिका एक ग्राहक की ही दिखाई देती है। केवल व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति के लिए यौन सेवा के बदले भुगतान करना अपने आप में अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत अपराध नहीं बनता।

धारा 3, 5 और 7 में कार्रवाई पर अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धाराओं के तहत कार्रवाई के लिए केवल ग्राहक का होना पर्याप्त आधार नहीं है। अदालत के अनुसार, वेश्यावृत्ति के व्यावसायिक शोषण अथवा उससे संबंधित गतिविधियों में भूमिका का होना जरूरी है।

इसी आधार पर अदालत ने नितिन के खिलाफ धारा 3, 5 और 7 के तहत आगे की कार्यवाही जारी रखने को उचित नहीं माना। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान होगा।

आरोपपत्र और समन आदेश भी रद्द

फैसले के बाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद की संबंधित निचली अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया। इसके साथ ही आरोपी के खिलाफ दाखिल आरोपपत्र और जारी समन आदेश भी रद्द कर दिए गए।अदालत के इस फैसले ने स्पष्ट किया है कि केवल ग्राहक के रूप में वेश्यालय में मौजूद होना और यौन सेवा के लिए भुगतान करना अपने आप में अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धाराओं 3, 5 और 7 के तहत अभियोजन का पर्याप्त आधार नहीं है।

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