नई दिल्ली। वर्ष 2010 में दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ खेलों ने देश-दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा था। इसी आयोजन के साथ एक नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा—सुरेश कलमाड़ी। वही सुरेश कलमाड़ी, जिन्होंने मंगलवार को पुणे में 81 वर्ष की उम्र में जीवन की अंतिम उड़ान भरी। एक ऐसा चेहरा, जिसने कभी फाइटर पायलट के तौर पर आसमान नापा, फिर राजनीति और खेल प्रशासन में ऊंचाइयों तक पहुंचा, लेकिन अंततः विवादों की परछाइयों से खुद को अलग नहीं कर सका।

सुरेश का जन्म 10 मई 1944 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था

सुरेश कलमाड़ी का जन्म 10 मई 1944 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई से लेकर उच्च शिक्षा तक उन्होंने पुणे में ही समय बिताया। छात्र जीवन से ही वे नेतृत्व क्षमता और संगठन कौशल के लिए पहचाने जाने लगे थे। सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हुए उन्होंने धीरे-धीरे राजनीति की ओर कदम बढ़ाया।राजनीति में आने से पहले कलमाड़ी का जीवन अनुशासन और साहस से भरा रहा। उन्होंने 1964 से 1972 तक भारतीय वायु सेना में पायलट के रूप में सेवा दी। वायुसेना में रहते हुए वे एक कुशल पायलट के तौर पर जाने गए। वर्ष 1974 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन को अपना लक्ष्य बनाया और राजनीति की उड़ान भरी।

1977 में सुरेश कलमाड़ी को पुणे युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया

1977 में सुरेश कलमाड़ी को पुणे युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद 1978 से 1980 तक उन्होंने महाराष्ट्र युवा कांग्रेस की कमान संभाली। इसी दौरान उन्होंने संगठन और सत्ता के गलियारों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली। 1980 में महाराष्ट्र एथलेटिक्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बनने के बाद खेल प्रशासन से उनका रिश्ता और गहरा हो गया। मॉस्को ओलंपिक के लिए भारतीय मैराथन टीम के चयन परीक्षण की जिम्मेदारी भी उन्होंने निभाई।साल 1982 में सुरेश कलमाड़ी पहली बार लोकसभा पहुंचे। इसके बाद 1985 से 1995 तक वे लगातार चार बार सांसद चुने गए और पुणे का प्रतिनिधित्व किया। कांग्रेस सरकार में उन्हें 1995-96 के दौरान रेल राज्य मंत्री बनाया गया। संसद और मंत्रालय में उनकी गिनती प्रभावशाली नेताओं में होने लगी।

जब वे इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष बने

खेल प्रशासन में उनका कद तब और बढ़ा, जब वे इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। अंतरराष्ट्रीय खेल मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका भी उन्हें मिला। इसी अनुभव के आधार पर वर्ष 2010 में दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति की कमान उन्हें सौंपी गई। यह आयोजन भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा के लिए बेहद अहम माना जा रहा था।लेकिन यहीं से उनके जीवन का सबसे विवादास्पद अध्याय शुरू हुआ। कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन में देरी, घटिया निर्माण कार्य, खर्च में असामान्य बढ़ोतरी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए। जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि खेलों के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया। इन आरोपों ने न सिर्फ आयोजन को बल्कि कलमाड़ी की राजनीतिक साख को भी गहरा झटका दिया।

वर्ष 2011 में सुरेश कलमाड़ी की गिरफ्तारी हुई

वर्ष 2011 में सुरेश कलमाड़ी की गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल जाना पड़ा। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया। एक समय सत्ता और खेल प्रशासन की ऊंचाइयों पर पहुंचा यह नेता अचानक विवादों का चेहरा बन गया। यही दौर उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।सुरेश कलमाड़ी का जीवन एक ऐसी कहानी बन गया, जिसमें उपलब्धियां भी हैं, सत्ता भी है, सम्मान भी है—और साथ ही विवादों का लंबा साया भी। उनकी मौत के साथ भारतीय राजनीति और खेल प्रशासन के उस अध्याय का अंत हो गया, जिसे देश लंबे समय तक याद करता रहेगा।

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