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कान्हा की डगर पर आईपीएस अफसरों का अद्भुत समर्पण

एसएमयूपीन्यूज, लखनऊ ।जन्माष्टमी के अवसर पर कुछ ऐसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी चर्चा में हैं, जिन्होंने उच्च पद और सुविधाएं छोड़कर अपना जीवन भक्ति को समर्पित कर दिया। हरियाणा की भारती अरोड़ा, बिहार के गुप्तेश्वर और कुणाल, तथा यूपी के डीके पांडा सभी ने सांसारिक मोह त्यागकर श्रीकृष्ण व प्रभु की सेवा का मार्ग चुना।

जब वर्दी छोड़ भक्ति का रास्ता चुन लिया अफसरों ने

जन्माष्टमी का पर्व आते ही सिर्फ मंदिर ही नहीं, बल्कि इंसानों के दिल भी श्रीकृष्ण की भक्ति से भर उठते हैं। पर कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनके लिए भक्ति सिर्फ पूजा का कर्मकांड नहीं रहती, बल्कि जीवन का संपूर्ण मार्ग बन जाती है। जिन्होंने ऊँचे ओहदे, रुतबा और सम्मान छोड़कर ईश्वर की राह पकड़ ली।

अब उनकी असली ड्यूटी श्रीकृष्ण की सेवा : भारतीय अरोड़ा

हरियाणा कैडर की सीनियर आईपीएस अधिकारी भारती अरोड़ा इसका बड़ा उदाहरण हैं। साल 2021 में जब उन्होंने अचानक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली, तो सिस्टम चौंक गया। आईजी रैंक तक पहुँची अफसर का कहना था – अब उनकी असली ड्यूटी श्रीकृष्ण की सेवा है।

अब पूर्वी डीजीपी कृष्ण कथा गाने वाले माने जाते हैं संत

बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय भी इसी राह पर चल पड़े। एक समय वो राजनीति और पुलिसिंग दोनों में सक्रिय रहे, लेकिन फिर सब छोड़कर भक्ति की राह थाम ली। आज वे वर्दीधारी अफसर नहीं, बल्कि कृष्ण कथा गाने वाले संत के रूप में जाने जाते हैं।

भक्ति के लिए तेज तर्रार आईपीएस कुणाल ने छोड़ दी नौकरी

इसी बिहार से एक और नाम उभरा – किशोर कुणाल। तेज-तर्रार और ईमानदार आईपीएस अफसर माने जाने वाले कुणाल ने अचानक नौकरी छोड़ दी। फर्क बस इतना था कि उनकी राह कृष्ण नहीं, बल्कि प्रभु श्री हनुमान की थी। अब वे पटना के महावीर मंदिर ट्रस्ट के सचिव हैं और अपनी सामाजिक-धार्मिक सेवाओं के लिए सम्मानित हैं।

राधा बन गए आईपीएस डीके पांडा

और अंत में सबसे चर्चित नाम है उत्तर प्रदेश के आईपीएस डी.के. पांडा। उनकी भक्ति ने उन्हें अद्भुत रास्ते पर ला खड़ा किया। वे खुद को मीरा की तरह राधा मानते हैं। दावा करते हैं कि श्रीकृष्ण ने सपने में दर्शन देकर उन्हें राधा स्वीकार किया। तब से उन्होंने वर्दी नहीं, बल्कि राधा का श्रृंगार ओढ़ लिया।

इन अफसरों की जिंदगी देतीं है यह संदेश

इन चारों की कहानियाँ यही बताती हैं कि सत्ता, शोहरत और पद सब अस्थायी हैं। असली संतोष तब मिलता है, जब इंसान अपने दिल की पुकार सुनकर प्रभु की शरण में चला जाए। जन्माष्टमी पर इन अफसरों की ज़िंदगी हमें यही संदेश देती है कि जब कृष्ण बुलाते हैं, तो वर्दी और कुर्सी भी मामूली हो जाती है।

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