‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ की तुलसी ने घर-घर में बनाई पहचान, स्मृति ईरानी ने राजनीति में कदम रखकर बदली अपनी राह
मुंबई। भारतीय टेलीविजन के इतिहास में कुछ किरदार ऐसे हैं, जिन्हें दर्शक सिर्फ पर्दे पर नहीं देखते, बल्कि लंबे समय तक अपने जेहन में बसाए रखते हैं। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ की तुलसी विरानी भी ऐसा ही एक किरदार रही हैं। संवेदनशील, संस्कारी और परिवार को जोड़कर रखने वाली तुलसी मुश्किल हालात में अपने फैसलों पर मजबूती से खड़ी नजर आती थीं। इस भूमिका ने स्मृति ईरानी को घर-घर में पहचान दिलाई और उन्हें टेलीविजन की चर्चित अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया।
साल 2000 में शुरू हुआ यह धारावाहिक लंबे समय तक भारतीय टेलीविजन के सबसे लोकप्रिय कार्यक्रमों में रहा। तुलसी विरानी के रूप में स्मृति ईरानी की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि उनका नाम ही इस किरदार के साथ गहराई से जुड़ गया। दर्शकों के लिए तुलसी सिर्फ एक बहू या मां का किरदार नहीं थीं, बल्कि वह ऐसी महिला की छवि थीं, जो परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपने आत्मसम्मान और फैसलों के लिए भी खड़ी रहती है।
तुलसी ने दी घर-घर पहचान
स्मृति ईरानी के अभिनय करियर में तुलसी विरानी की भूमिका एक निर्णायक मोड़ साबित हुई। पारिवारिक रिश्तों, संघर्षों और भावनात्मक उतार-चढ़ाव से गुजरती तुलसी ने दर्शकों के साथ ऐसा जुड़ाव बनाया कि वह टीवी की सबसे यादगार महिला पात्रों में गिनी जाने लगीं।
इस भूमिका के लिए स्मृति ईरानी को कई पुरस्कार भी मिले। भारतीय टेली अवॉर्ड्स में उन्हें तुलसी के किरदार के लिए लगातार दो वर्षों में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री सहित अन्य सम्मान मिले।
लेकिन स्मृति ईरानी का सफर यहीं रुकने वाला नहीं था। टेलीविजन की सफलता के बीच उन्होंने अपने लिए एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना।
टीवी की दुनिया से राजनीति के मंच तक
स्मृति ईरानी ने मनोरंजन की दुनिया से राजनीति की ओर कदम बढ़ाया। यह बदलाव आसान नहीं था। जिस महिला को देश का एक बड़ा वर्ग तुलसी के नाम से पहचानता था, उसे अब वास्तविक राजनीतिक दुनिया में अपनी पहचान बनानी थी।
राजनीति में आने के बाद उनका सार्वजनिक जीवन चुनावी अभियानों, राजनीतिक बहसों और संगठनात्मक जिम्मेदारियों से जुड़ता गया। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी टेलीविजन वाली पहचान से अलग एक राजनीतिक व्यक्तित्व स्थापित किया।
उनका राजनीतिक सफर भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा। 2019 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से राहुल गांधी को हराकर उनकी जीत ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में खास पहचान दिलाई। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें अमेठी सीट पर हार का सामना करना पड़ा।
असफलता के बाद भी जारी रहा सफर
राजनीति में जीत और हार के बीच स्मृति ईरानी ने सार्वजनिक जीवन से दूरी नहीं बनाई। हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में उन्हें भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय टीम में महासचिव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। इससे राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका की वापसी भी चर्चा में आई है।
यानी एक समय जिस स्मृति ईरानी की पहचान तुलसी विरानी के रूप में थी, वही चेहरा अब राजनीतिक रणनीति और सार्वजनिक संवाद के लिए भी जाना जाता है।
फिर पर्दे पर लौटीं ‘तुलसी’
स्मृति ईरानी ने करीब दो दशक बाद एक बार फिर तुलसी विरानी का किरदार निभाकर टेलीविजन पर वापसी की। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी 2’ में उनकी वापसी ने पुराने दर्शकों के बीच खास उत्सुकता पैदा की। शो का नया संस्करण 2025 में शुरू हुआ और स्मृति ईरानी ने इसमें फिर तुलसी की भूमिका संभाली।
2026 में भी शो की कहानी में तुलसी केंद्रीय भूमिका में बनी हुई हैं। हाल के एपिसोड में परिवार के भीतर रिश्तों और फैसलों को लेकर उनके किरदार के सामने नई चुनौतियां दिखाई गई हैं।
तुलसी और स्मृति की कहानी में दिखता है एक रिश्ता
तुलसी एक काल्पनिक किरदार थीं, जबकि स्मृति ईरानी का राजनीतिक सफर वास्तविक दुनिया का हिस्सा है। दोनों के रास्ते अलग हैं, लेकिन दोनों कहानियों में एक समानता जरूर दिखाई देती है—मुश्किल परिस्थितियों में आगे बढ़ने की कोशिश।
तुलसी ने परिवार और रिश्तों के संघर्षों के बीच अपनी आवाज बुलंद की, जबकि स्मृति ईरानी ने मनोरंजन की स्थापित पहचान से आगे निकलकर राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश की। यही वजह है कि स्मृति का सफर सिर्फ एक अभिनेत्री के राजनीति में आने की कहानी नहीं रह जाता।
यह उस महिला की कहानी बन जाता है जिसने अपनी पहली बड़ी पहचान को अपनी अंतिम मंजिल नहीं बनने दिया।तुलसी ने उन्हें पहचान दी, लेकिन स्मृति ईरानी ने उस पहचान से आगे बढ़कर अपनी एक अलग कहानी लिखी।
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