लखनऊ । उत्तर प्रदेश में गर्मियों से पहले ही बिजली व्यवस्था पर बड़ा संकट मंडराने लगा है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सुनियोजित तरीके से सिस्टम को कमजोर किया जा रहा है।समिति का दावा है कि बड़े पैमाने पर संविदा कर्मियों की छंटनी की जा रही है और नियमित कर्मचारियों व जूनियर इंजीनियरों को मनमाने ढंग से निलंबित किया जा रहा है। इससे आने वाले समय में बिजली आपूर्ति चरमराने की पूरी आशंका है।

बढ़ती मांग, घटती व्यवस्था

संघर्ष समिति के मुताबिक इस बार गर्मियों में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार देश में मांग 270 गीगावाट तक जा सकती है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 36,000 मेगावाट तक पहुंचने का अनुमान है। ऐसे समय में अनुभवी कर्मियों को हटाना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन

इन फैसलों के खिलाफ प्रदेश के सभी जिलों में बिजली कर्मियों ने अपने-अपने दफ्तरों के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। कर्मचारियों का कहना है कि यह कदम बिजली व्यवस्था को जानबूझकर कमजोर करने की साजिश है।

निजीकरण का आरोप

संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि प्रबंधन “वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग” के नाम पर कर्मचारियों को हटा रहा है ताकि भविष्य में शहरी बिजली व्यवस्था निजी कंपनियों को सौंपी जा सके। लखनऊ, अयोध्या और मेरठ समेत कई शहरों में सैकड़ों संविदा कर्मियों को हटाया जा चुका है।

चौंकाने वाले आंकड़े

लखनऊ (लेसा) में 340 कर्मी हटाए गए

मेरठ में 193 कर्मी बाहर

अयोध्या में 52 कर्मियों की छंटनी

कई जगह 36 की जगह सिर्फ 9 कर्मचारी ही बचे

आंदोलन तेज करने की चेतावनी

संघर्ष समिति ने साफ कहा है कि यदि छंटनी और उत्पीड़न नहीं रुका तो प्रदेशव्यापी बड़ा आंदोलन किया जाएगा। 11 अप्रैल को लखनऊ में केंद्रीय बैठक बुलाकर आगे की रणनीति तय होगी।

491वें दिन भी जारी आंदोलन

निजीकरण के विरोध में कर्मचारियों का आंदोलन लगातार जारी है और अब यह 491वें दिन में प्रवेश कर चुका है।गर्मियों के चरम से पहले ही बिजली व्यवस्था पर संकट के संकेत साफ हैं। यदि हालात नहीं सुधरे तो आने वाले महीनों में प्रदेश को बड़े बिजली संकट का सामना करना पड़ सकता है।

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