लखनऊ । उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में एक बार फिर सिस्टम की लापरवाही ने एक मासूम की जान ले ली। गांव दलेलगढ़ में शनिवार दोपहर खेलते-खेलते तीन साल का देवांश छह से सात फीट गहरे पानी भरे गड्ढे में गिर गया और डूबकर उसकी मौत हो गई। यह वही गड्ढा है, जिसे लेकर ग्रामीण महीनों से खतरे की घंटी बजा रहे थे—लेकिन प्रशासन और प्राधिकरण की फाइलों में सब “ठीक” चलता रहा।
एक महीने में तीसरी मौत, फिर भी आंख नहीं खुली
नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता, दिल्ली में कमल और अब ग्रेटर नोएडा में मासूम देवांश—एक ही महीने में लापरवाही के गड्ढों ने तीन जिंदगियां निगल लीं। सवाल यह है कि आखिर कब तक ऐसे जानलेवा गड्ढे यूं ही लोगों की कब्र बनते रहेंगे?
धार्मिक आयोजन बना मातम
देवांश अपनी मां अंजली के साथ गांव दलेलगढ़ में मामा के घर 41 दिन के धार्मिक अनुष्ठान में आया था। डालेश्वर बाबा की समाधि पर भंडारा चल रहा था। खुशी और श्रद्धा के माहौल में अचानक चीख-पुकार मच गई। खेलते-खेलते देवांश गायब हो गया। कुछ देर खोजबीन के बाद जब किसी की नजर गड्ढे में तैरती बच्चे की टोपी पर पड़ी, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।पानी में उतरकर बच्चे को निकाला गया, अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। एक पल में पूरा आयोजन मातम में बदल गया।
“पशुचर जमीन है”, “किसान की जमीन है”—जिम्मेदारी किसकी?
ग्रामीणों का आरोप है कि यह गड्ढा पशुचर जमीन पर है। कभी प्राधिकरण तो कभी ग्रामीणों द्वारा मिट्टी निकाले जाने से यह गड्ढा बनता चला गया। बारिश और नालियों का पानी भरता गया और यह मौत का कुआं बन गया।ग्रामीण अमित भाटी, कृष्णकांत शर्मा, विनोद, लीलू प्रधान और रवि का कहना है कि उन्होंने कई बार ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से तारबंदी कराने की मांग की थी, लेकिन हर बार अनदेखी की गई।वहीं प्राधिकरण के जीएम एके सिंह का कहना है कि यह गड्ढा खसरा संख्या 373 की भूमि पर है, जो ग्रामीण गंगाराम और धर्मवीर की निजी जमीन है, इसलिए प्राधिकरण सीधे कार्रवाई नहीं कर सकता।
प्रशासन मौके पर, लेकिन कार्रवाई फाइलों तक?
घटना के बाद सदर तहसीलदार डॉ. अजय, नायब तहसीलदार ज्योत सिंह, लेखपाल और फिर उप जिलाधिकारी आशुतोष गुप्ता मौके पर पहुंचे। निरीक्षण हुआ, तस्वीरें ली गईं, बयान दर्ज हुए—लेकिन सवाल वही है, क्या अब भी सिर्फ “निरीक्षण” ही होगा?सुधीर सिंह का कहना है कि परिवार की ओर से अभी कोई शिकायत नहीं दी गई है, शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी।
बड़ा सवाल: क्या मासूम की जान की कीमत एक शिकायत है?
ग्रामीण पूछ रहे हैं—क्या किसी बच्चे की जान जाने के बाद भी प्रशासन शिकायत का इंतजार करेगा? क्या तारबंदी, चेतावनी बोर्ड या गड्ढा भरने जैसी कार्रवाई किसी हादसे से पहले नहीं हो सकती थी?देवांश की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की सामूहिक विफलता है। अगर अब भी ऐसे जानलेवा गड्ढों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो अगला शिकार कौन होगा—यह कोई नहीं जानता।
