लखनऊ।उत्तर प्रदेश में पॉवर सेक्टर में “क्रांतिकारी सुधार” के सरकारी दावों के बीच ऊर्जा निगमों के निजीकरण को लेकर विरोध तेज हो गया है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने विधानसभा में महामहिम राज्यपाल के अभिभाषण पर प्रतिक्रिया देते हुए सरकार से कई तीखे सवाल खड़े किए हैं। समिति का कहना है कि जब स्वयं सरकार बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण व्यवस्था में व्यापक सुधार होने की बात स्वीकार कर रही है, तो फिर निजीकरण की प्रक्रिया चलाने का औचित्य क्या है।
विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल निरस्त की जाए
संघर्ष समिति के केंद्रीय पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील की है कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल निरस्त की जाए। साथ ही बिजली कर्मियों, विशेषकर संविदा कर्मचारियों पर की जा रही दंडात्मक और उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयों को भी वापस लिया जाए।संघर्ष समिति ने कहा कि उत्तर प्रदेश को बीमारू राज्य की छवि से निकालकर आर्थिक “ब्रेक-थ्रू स्टेट” बनाने में बिजली व्यवस्था की भूमिका सबसे अहम रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 19 घंटे बिजली आपूर्ति हो रही
समिति ने निजीकरण के समर्थकों द्वारा 24 घंटे बिजली आपूर्ति के दावे पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि राज्यपाल के अभिभाषण में स्वयं जनपद मुख्यालयों पर 24 घंटे बिजली आपूर्ति की पुष्टि की गई है। वर्तमान में तहसील मुख्यालयों पर औसतन 21 घंटे 49 मिनट और ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 19 घंटे बिजली आपूर्ति हो रही है, ऐसे में निजीकरण के बाद इससे अधिक सुधार क्या संभव है।संघर्ष समिति ने यह भी रेखांकित किया कि सार्वजनिक क्षेत्र में बिजली व्यवस्था के प्रभावी संचालन का ही परिणाम है कि पिछले छह वर्षों से प्रदेश में बिजली दरों में कोई वृद्धि नहीं की गई है। उत्तर प्रदेश उत्तरी भारत का एकमात्र राज्य है, जहां इस अवधि में टैरिफ स्थिर बना हुआ है।

विद्युत उत्पादन क्षमता में 55.16 प्रतिशत की वृद्धि हुई
आंकड़े प्रस्तुत करते हुए समिति ने बताया कि वर्ष 2017 की तुलना में प्रदेश की विद्युत उत्पादन क्षमता में 55.16 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो 5878 मेगावाट से बढ़कर 9120 मेगावाट तक पहुंच गई है। जल विद्युत उत्पादन में भी उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। ‘झटपट पोर्टल’ के माध्यम से 50 लाख से अधिक नए उपभोक्ताओं को बिजली कनेक्शन दिया गया है, जबकि ट्रांसमिशन सेक्टर में 208 नए उपकेंद्र स्थापित किए गए हैं। संघर्ष समिति के अनुसार, पॉवर सेक्टर में हुए इन गुणात्मक सुधारों का सकारात्मक असर कृषि उत्पादन, औद्योगिक विकास और कानून-व्यवस्था पर भी पड़ा है। बेहतर बिजली आपूर्ति ने प्रदेश के समग्र विकास को मजबूती दी है।
दंडात्मक कार्रवाई को लेकर संघर्ष समिति ने गहरी चिंता जताई
इसके बावजूद बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी, खासकर अल्प वेतनभोगी संविदा कर्मियों को हटाने और नियमित कर्मचारियों पर दंडात्मक कार्रवाई को लेकर संघर्ष समिति ने गहरी चिंता जताई है। समिति ने कहा कि बिजली व्यवस्था में सुधार अभियंताओं, कर्मचारियों और संविदा कर्मियों के अथक परिश्रम का परिणाम है, ऐसे में छंटनी पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।संघर्ष समिति ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि छंटनी की प्रक्रिया तत्काल रोकी जाए और सभी प्रकार की उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयों को वापस लिया जाए, ताकि बिजली व्यवस्था में स्थिरता और कार्यस्थल पर सकारात्मक माहौल बना रहे।
