मुजफ्फरनगर। पुरकाजी क्षेत्र में हुए प्रॉपर्टी डीलर संजीव उर्फ जीवन हत्याकांड ने पहले पूरे इलाके को दहला दिया, और अब इस मामले से जुड़ा एक फैसला लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहा है। हत्या, बेवफाई और साजिश के बीच से निकलकर यह कहानी अब त्याग, जिम्मेदारी और टूटे परिवार को जोड़ने की कोशिश में बदल गई है।

तीनों बच्चों को अपनाने का निर्णय लिया

संजीव की हत्या के बाद उसके पीछे रह गए तीन मासूम बच्चे, एक जेल में बंद मां और बदनामी से जूझता परिवार—इन सबके बीच संजीव के छोटे भाई मीनू ने ऐसा फैसला लिया है, जिसने पूरे गांव को चौंका दिया।उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल की ट्रेनिंग ले रहे मीनू ने अपनी भाभी सोनिया से विवाह करने और तीनों बच्चों को अपनाने का निर्णय लिया है।यह फैसला बुधवार को मृतक संजीव के तीजा कार्यक्रम के दौरान लिया गया, जहां परिवार के बुजुर्गों, रिश्तेदारों और समाज के लोगों की मौजूदगी में सर्वसम्मति से यह तय किया गया कि बच्चों का भविष्य किसी भी कीमत पर अंधेरे में नहीं जाने दिया जाएगा।

2 फरवरी की रात… जब सब कुछ खत्म हो गया

पूरा मामला 2 फरवरी का है। पुरकाजी थाना क्षेत्र के गांव हरीनगर में प्रॉपर्टी डीलर संजीव की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। पुलिस जांच में सनसनीखेज खुलासा हुआ कि इस वारदात को संजीव की पत्नी सोनिया ने अपने प्रेमी सादिक के साथ मिलकर अंजाम दिया।पति की हत्या में पत्नी की संलिप्तता सामने आते ही पूरे इलाके में सनसनी फैल गई थी। सोनिया और उसका प्रेमी जेल भेजे जा चुके हैं।

तीन मासूम… जिनका कसूर कुछ भी नहीं

इस जघन्य हत्याकांड में सबसे ज्यादा चोट उन तीन बच्चों को लगी, जिनका न पिता रहा और न मां। एक तरफ पिता की हत्या का दाग, दूसरी तरफ मां का जेल जाना—बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया था।इसी मोड़ पर मीनू सामने आए। उन्होंने कहा—“गलती बड़ों ने की है, सजा बच्चों को नहीं मिलनी चाहिए।”

यूपी पुलिस का सिपाही, परिवार का सहारा

मीनू खुद इस वक्त उत्तर प्रदेश पुलिस में भर्ती होकर ट्रेनिंग ले रहे हैं। सीमित संसाधनों और अपने करियर की शुरुआत के बावजूद उन्होंने पूरे परिवार को संभालने की जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया।उन्होंने न सिर्फ बच्चों की परवरिश का जिम्मा लिया, बल्कि समाज में उन्हें सम्मान के साथ बड़ा करने का संकल्प भी लिया है।

गांव में चर्चा, समाज में बहस

गांव और आसपास के इलाके में इस फैसले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कोई इसे रिश्तों की मजबूरी बता रहा है, तो कोई इसे त्याग और सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल कह रहा है।एक बात पर सभी सहमत हैं—यह फैसला आसान नहीं था।संजीव की हत्या की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि यह कहानी अब इंसानियत, साहस और टूटे रिश्तों को जोड़ने की जद्दोजहद का प्रतीक बन गई है।यह सिर्फ एक हत्या के बाद लिया गया फैसला नहीं, बल्कि एक परिवार को दोबारा खड़ा करने की कोशिश है—उस अंधेरे में, जहां रोशनी बची ही नहीं थी।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *