एसएमयूपीन्यूज, लखनऊ । ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (All India Power Engineers Federation) के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026 को पावर सेक्टर और बिजली कर्मचारियों के लिए अत्यंत निराशाजनक करार दिया है। उन्होंने कहा कि इस बजट से बिजली क्षेत्र को मजबूत करने की उम्मीद थी, लेकिन बजट में न तो कोई स्पष्ट नीति दिखाई दी और न ही कोई ठोस दिशा तय की गई।
DISCOMs को लेकर कोई ठोस प्रावधान नहीं
शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि बजट से यह अपेक्षा थी कि सार्वजनिक क्षेत्र की विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOMs) के लगातार बढ़ते वित्तीय घाटे को कम करने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए स्पष्ट और ठोस प्रावधान किए जाएंगे।उन्होंने कहा कि देशभर में डिस्कॉम की स्थिति लगातार खराब हो रही है और घाटा बढ़ता जा रहा है। इसके बावजूद बजट 2026 में डिस्कॉम सुधार को लेकर कोई प्रभावी योजना सामने नहीं आई, जो कि पावर सेक्टर के भविष्य के लिए चिंता का विषय है।
ट्रांसमिशन सेक्टर में निजीकरण पर बजट मौन
फेडरेशन चेयरमैन ने कहा कि ट्रांसमिशन सेक्टर में टैरिफ बेस्ड कॉम्पिटेटिव बिडिंग (TBCB) के नाम पर तेजी से निजीकरण किया जा रहा है।उन्होंने स्पष्ट कहा कि ट्रांसमिशन नेटवर्क देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा है और इस क्षेत्र में निजीकरण को रोकने के लिए बजट में घोषणा की उम्मीद थी, लेकिन बजट 2026 में इस पर पूर्ण मौन रहा।
सस्ती बिजली के लिए नए सरकारी बिजलीघर पर चर्चा नहीं
शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि देश में सबसे सस्ती बिजली उत्पादन के लिए नए सार्वजनिक क्षेत्र के बिजलीघरों की स्थापना बेहद जरूरी है।लेकिन बजट 2026 में न तो नए सरकारी बिजलीघरों की स्थापना पर कोई चर्चा की गई और न ही बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए कोई स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत किया गया।उन्होंने कहा कि बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और डिस्कॉम—तीनों महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बजट 2026 में कोई ठोस नीति नजर नहीं आती।
कर्मचारियों की उम्मीदों पर भी पानी फिरा
फेडरेशन चेयरमैन ने बजट 2026 को कर्मचारियों के लिए भी निराशाजनक बताया।उन्होंने कहा कि बिजली कर्मचारियों सहित देश के लाखों कर्मचारियों को उम्मीद थी कि बजट में—पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली, इनकम टैक्स छूट सीमा में वृद्धिए स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ाने जैसी घोषणाएं की जाएंगी।लेकिन बजट में इन मुद्दों पर कोई राहत नहीं दी गई, जिससे कर्मचारी वर्ग में नाराजगी है।
PFC और REC के पुनर्गठन पर आशंका
शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि बजट में पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC) और रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉरपोरेशन (REC) के पुनर्गठन की घोषणा तो की गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह पुनर्गठन किस स्वरूप में होगा।उन्होंने कहा कि PFC और REC दोनों संस्थाएं राज्यों के पावर सेक्टर को वित्तीय मदद देती हैं और दोनों ही नॉन-बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं (NBFCs) हैं।फेडरेशन ने आशंका जताई कि पुनर्गठन के बाद इन्हें बैंकिंग संस्था का स्वरूप देकर राज्यों को मिलने वाले वित्तीय पैकेज में गारंटीड रिटर्न के नाम पर निजीकरण की शर्तें जोड़ी जा सकती हैं।
ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक का हवाला
शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि 10 अक्टूबर 2025 को हुई ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (GoM) की बैठक में यह सुझाव दिया गया था कि केंद्र से मिलने वाले वित्तीय पैकेज के लिए राज्यों को तीन विकल्प दिए जाएं—
DISCOM की 51% इक्विटी बेच दी जाए
26% इक्विटी बेची जाए और प्रबंधन निजी घरानों को सौंप दिया जाए
DISCOM को स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट (Enlist) किया जाए
उन्होंने कहा कि ये तीनों विकल्प निजीकरण के ही रास्ते हैं।
फेडरेशन का आरोप है कि बजट में PFC और REC के पुनर्गठन की बात इसी प्रस्ताव को लागू करने की दिशा में कदम हो सकता है।
निजीकरण की कोशिश हुई तो होगा निर्णायक विरोध
शैलेन्द्र दुबे ने चेतावनी दी कि यदि PFC और REC के पुनर्गठन के नाम पर बिजली क्षेत्र के निजीकरण की कोई भी कोशिश की गई, तो देशभर के बिजली कर्मचारी और अभियंता इसका पुरजोर और निर्णायक विरोध करेंगे।उन्होंने कहा कि बिजली क्षेत्र का निजीकरण कर्मचारियों के अधिकारों, उपभोक्ताओं की सुविधाओं और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है।
