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स्थानांतरित अफसर को बना दिया जांच अधिकारी, एफआईआर में लापरवाही की खुली पोल

एसएमयूपीन्यूज,लखनऊ राजधानी में पुलिस कमिश्नरेट इन दिनों अपने अजीबो-गरीब फैसलों और लापरवाहियों के चलते लगातार चर्चा में बनी हुई है। ताज़ा मामला रहीमाबाद थाने से सामने आया है, जहां एक गंभीर एफआईआर में उस अधिकारी को जांच अधिकारी बना दिया गया है जिसका तबादला डेढ़ माह पहले ही हो चुका है। इस चौंकाने वाली लापरवाही ने पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

एफआईआर दर्ज कराने के बाद सच निकलकर आया सामने

मामला रहीमाबाद थाना क्षेत्र के भतोईया गांव का है। यहां की पूर्व ग्राम प्रधान मुन्नी देवी के बेटे शुभम कुमार ने मनकौटी गांव के चार लोगों — वकील, शकील, अकील और अयान — के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई है। पीड़ित का आरोप है कि 19 अप्रैल को कार से लौटते समय आरोपितों ने पहले उनकी गाड़ी को टक्कर मारी, फिर हथियार से हमला किया और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर उन्हें व उनकी मां को अपमानित किया।

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FIR में आज भी चल रहा जांच अधिकारी एसीपी अमोल का नाम

एफआईआर तो दर्ज हो गई, लेकिन इसमें जांच अधिकारी के रूप में नाम दर्ज किया गया है एसीपी अमोल मुर्कुट का — जिनका तबादला 6 मार्च को हो चुका था और वह 7 मार्च को कार्यमुक्त भी हो चुके थे। यही नहीं, एफआईआर की कॉपी में 14 अप्रैल को ट्रांसफर हो चुके इंस्पेक्टर अनुभव सिंह का नाम और डिजिटल हस्ताक्षर तक दर्ज हैं, जबकि वर्तमान समय में थाने की जिम्मेदारी इंस्पेक्टर आनंद द्विवेदी संभाल रहे हैं।

कहीं तकनीकी बहाना, कहीं चुप्पी, जवाबदेही नदारद

जब इस विसंगति पर सवाल उठाए गए, तो वर्तमान एसएचओ आनंद द्विवेदी ने सफाई दी कि अभी तक सिस्टम में पूर्व इंस्पेक्टर की डिजिटल आईडी अपडेट नहीं हुई है, इसी वजह से पुराने हस्ताक्षर दर्ज हो गए। लेकिन जब पूर्व एसीपी को जांच अधिकारी बनाए जाने पर सवाल किया गया, तो वह कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे सके।

इस पूरे मामले में कई अनसुलझे सवाल

-जब एसीपी अमोल मुर्कुट का ट्रांसफर हो चुका था, तो उन्हें जांच अधिकारी क्यों बनाया गया?

-14 अप्रैल को स्थानांतरित हो चुके इंस्पेक्टर अनुभव सिंह के डिजिटल हस्ताक्षर एफआईआर पर कैसे दर्ज हुए?

-क्या इस लापरवाही से जांच की निष्पक्षता प्रभावित नहीं होगी?

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प्रशासनिक चूक या जांच को प्रभावित करने की साज़िश

यह महज़ तकनीकी चूक है या जानबूझकर जांच को कमजोर करने की कोशिश — यह सवाल अब तेज़ी से उठने लगे हैं। खासतौर पर जब मामला एससी-एसटी एक्ट से जुड़ा हो, तो पुलिस की हर कार्रवाई संवेदनशील होती है। ऐसे में जिम्मेदार अफसरों की चुप्पी और तर्कों ने संदेह और गहरा कर दिया है।

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