लखनऊ। राजधानी में रविवार को विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति की प्रांतीय पदाधिकारियों की एक अहम बैठक आयोजित हुई, जिसमें प्रदेशभर से लगभग 1000 से अधिक बिजली कर्मचारी एवं अभियंता शामिल हुए। बैठक में सर्वसम्मति से कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए और पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया गया।

अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को तत्काल वापस नहीं लिया गया

बैठक में साफ तौर पर चेतावनी दी गई कि यदि आंदोलन के दौरान बिजली कर्मियों पर की गई सभी उत्पीड़नात्मक और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को तत्काल वापस नहीं लिया गया, तो आने वाली भीषण गर्मियों में बिजली व्यवस्था प्रभावित होने की पूरी जिम्मेदारी शीर्ष प्रबंधन की होगी।

संघर्ष समिति ने कहा कि प्रबंधन अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए कर्मचारियों और अभियंताओं पर कार्रवाई कर रहा है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी भी कर्मचारी या अभियंता के खिलाफ उत्पीड़नात्मक कार्रवाई की गई, तो वे कार्यस्थल छोड़ने को बाध्य होंगे, जिससे बिजली आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे में इसके लिए पूरी तरह प्रबंधन जिम्मेदार होगा।

वाराणसी डिस्कॉम मुख्यालय पर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा

बैठक में 15 अप्रैल से 21 मई तक प्रदेशव्यापी “जन-जागरण अभियान” चलाने का ऐलान किया गया। इस अभियान के तहत केंद्रीय पदाधिकारी पूरे प्रदेश का दौरा करेंगे और विभिन्न जनपदों में उपभोक्ताओं एवं किसानों के साथ संयुक्त सभाएं आयोजित की जाएंगी।

इन सभाओं में आम जनता को यह बताया जाएगा कि पिछले 501 दिनों से चल रहे आंदोलन के बावजूद बिजली कर्मियों ने उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की असुविधा नहीं होने दी है और उनकी समस्याओं का प्राथमिकता के आधार पर समाधान किया है।संघर्ष समिति ने जनजागरण अभियान के तहत विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन की तिथियां भी घोषित कीं। इसके अनुसार 24 अप्रैल को मेरठ डिस्कॉम, 2 मई को केस्को, 6 मई को आगरा, 14 मई को लखनऊ और 21 मई को वाराणसी डिस्कॉम मुख्यालय पर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।

नियमित कर्मचारियों की संख्या लगातार घटाई जा रही

बैठक में पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन की नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा गया कि एक ओर जहां कर्मचारियों का उत्पीड़न किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर “वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग” के नाम पर संविदा कर्मियों की बड़े पैमाने पर छंटनी की जा रही है और नियमित कर्मचारियों की संख्या लगातार घटाई जा रही है।

इससे प्रदेश की बिजली व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना तय है।संघर्ष समिति ने मांग की कि आंदोलन के दौरान की गई सभी कार्रवाइयों को तत्काल वापस लिया जाए और सेवा से हटाए गए अनुभवी संविदा कर्मियों को पुनः बहाल किया जाए, ताकि बढ़ती बिजली मांग के बीच निर्बाध और सुचारु आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।समिति ने यह भी कहा कि बिजली कर्मी उपभोक्ताओं और किसानों के हितों के प्रति पूरी तरह संवेदनशील हैं और उनके सहयोग से ही आंदोलन को आगे बढ़ाया जा रहा है। उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, यह उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयों को वापस लेने के निर्देश दिए गए थे

बैठक में यह भी उल्लेख किया गया कि मार्च 2023 के आंदोलन के बाद 19 मार्च को ऊर्जा मंत्री द्वारा उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयों को वापस लेने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन आज तक उन पर अमल नहीं हुआ। इसके विपरीत लगातार नई कार्रवाइयां की जा रही हैं, जिससे प्रबंधन की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।संघर्ष समिति ने दोहराया कि यदि समय रहते मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

बैठक में संयोजक शैलेंद्र दुबे समेत कई पदाधिकारियों

बैठक में संयोजक शैलेंद्र दुबे समेत कई पदाधिकारियों—राहुल बाबू कटियार, जितेंद्र सिंह गुर्जर, महेंद्र राय, पी.के. दीक्षित, सुहेल आबिद, अंकुर पांडेय, चंद्र भूषण उपाध्याय, मोहम्मद वसीम, बिमल चंद्र पांडेय, मोहम्मद इलियास, प्रेमनाथ राय, श्रीचंद, सरजू त्रिवेदी, के.एस. रावत, सुरेंद्र सिंह, विशंभर सिंह, सनाउल्लाह, मनोज कुमार और रफीक अहमद—ने अपने विचार रखे।संघर्ष समिति ने अंत में कहा कि यदि प्रबंधन ने समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह प्रबंधन की होगी।

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