लखनऊ । उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग के निजीकरण के खिलाफ चल रहा आंदोलन अब एक बड़े पड़ाव पर पहुंच गया है। पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के विरोध में बिजली कर्मियों का आंदोलन 501 दिन पूरे करने जा रहा है।इसी क्रम में 12 अप्रैल को राजधानी लखनऊ में विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले पावर सेक्टर के 16 प्रमुख श्रम संघों और सेवा संगठनों की केंद्रीय कार्यकारिणी की संयुक्त बैठक और आमसभा आयोजित की जाएगी। इस बैठक में प्रदेशव्यापी आंदोलन की आगे की रणनीति तय की जाएगी।
कर्मचारियों ने तानाशाहीपूर्ण कदम बताया
संघर्ष समिति के पदाधिकारियों के अनुसार, आंदोलन के दौरान बिजली कर्मियों पर हुई उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियों को वापस कराने और आगे के आंदोलन को तेज करने पर चर्चा होगी।समिति ने आरोप लगाया कि ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा के 19 मार्च 2023 के निर्देशों के बावजूद पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन ने कर्मचारियों पर की गई कार्रवाई अब तक वापस नहीं ली है। इसके कारण कर्मचारियों के वेतन, पदोन्नति, वार्षिक वेतन वृद्धि और सेवानिवृत्ति लाभ प्रभावित हो रहे हैं।
कर्मचारियों ने तानाशाहीपूर्ण कदम बताया
संघर्ष समिति का कहना है कि नवंबर 2024 में निजीकरण के फैसले के बाद शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे कर्मचारियों का लगातार उत्पीड़न किया जा रहा है। मई 2025 में अनुशासनात्मक नियमों में बदलाव कर बिना जांच और आरोप-पत्र के कर्मचारियों को बर्खास्त करने का अधिकार भी प्रबंधन ने ले लिया, जिसे कर्मचारियों ने तानाशाहीपूर्ण कदम बताया है।
इसके अलावा कर्मचारियों ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं—
- बड़े पैमाने पर संविदा कर्मियों की छंटनी
- स्मार्ट प्रीपेड मीटर के जरिए सुविधाएं खत्म करने की कोशिश
- कर्मचारी नेताओं पर विजिलेंस जांच और फर्जी मुकदमे
- फेसियल अटेंडेंस के नाम पर वेतन रोकना
- महिला पदाधिकारियों सहित कर्मचारियों के दूरदराज तबादले
सभी उत्पीड़नात्मक कार्रवाई वापस नहीं ली गई
संघर्ष समिति ने साफ चेतावनी दी है कि यदि 12 अप्रैल तक सभी उत्पीड़नात्मक कार्रवाई वापस नहीं ली गई, तो उसी दिन लखनऊ में होने वाली आमसभा में बड़ा आंदोलनात्मक फैसला लिया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी प्रबंधन की होगी।इस बीच आंदोलन के 496 दिन पूरे होने पर प्रदेशभर में बिजली कर्मियों ने विरोध प्रदर्शन जारी रखा और 12 अप्रैल की बैठक को सफल बनाने के लिए तैयारियां तेज कर दी हैं।
