लखनऊ । ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई की शहादत की खबर से दुनियाभर के शिया समुदाय में गहरा शोक व्याप्त है। इस दुखद घटना के बाद धार्मिक विद्वानों और उलेमाओं द्वारा समुदाय को संयम और धैर्य बनाए रखने की अपील की जा रही है।
खामनेई की शहादत निश्चित रूप से अपूरणीय क्षति
इसी क्रम में प्रख्यात शिया धर्मगुरु जावेद हैदर जैदी ने एक अहम संदेश जारी करते हुए कहा कि खामनेई की शहादत निश्चित रूप से अपूरणीय क्षति है, लेकिन ऐसे समय में धार्मिक कर्तव्यों को नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने कहा कि ईद-उल-फ़ितर अल्लाह की बंदगी का दिन है और इसे सादगी, इबादत और ग़म के एहसास के साथ मनाना चाहिए।मौलाना जैदी ने अपने संदेश में इस्लामी इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि 21 रमज़ान 40 हिजरी के बाद भी इमाम हसन (अलैहिस्सलाम) ने उसी वर्ष ईद की नमाज़ अदा की थी। उन्होंने कहा कि ईद केवल खुशी का पर्व नहीं, बल्कि आत्ममंथन, गुनाहों से दूर रहने और अल्लाह के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने का अवसर भी है।
हर वह दिन ईद है जिसमें इंसान गुनाह से दूर रहे
उन्होंने आगे कहा“हर वह दिन ईद है जिसमें इंसान गुनाह से दूर रहे। असल ईद वही है, जिसमें इंसान अपने कर्मों का आकलन करे और अल्लाह की राह पर चले।”मौलाना ने ईद के बाद ‘ज़ियारत-ए-वारिसा’ की अहमियत पर भी जोर देते हुए बताया कि इसमें अहलुलबैत (अलैहिस्सलाम) की फज़ीलतों और उनकी मसीबतों का जिक्र किया जाता है, साथ ही अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने का संदेश भी निहित होता है।अंत में उन्होंने स्पष्ट किया कि इस वर्ष भी ईद-उल-फितर मनाई जानी चाहिए, लेकिन अहलुलबैत के बताए रास्ते पर चलते हुए, सादगी और इबादत के साथ, ताकि शोक और श्रद्धा दोनों का संतुलन बना रहे।
