लखनऊ । उत्तर प्रदेश में बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण के खिलाफ चल रहा आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। आंदोलन के 475 दिन पूरे होने पर संघर्ष और तेज हो गया है।ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के फेडरल एग्जीक्यूटिव द्वारा प्रदेश सरकार को भेजे गए समर्थन प्रस्ताव का विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने स्वागत किया है। समिति का कहना है कि यह समर्थन देशभर के करीब 27 लाख बिजली कर्मचारियों और अभियंताओं की एकजुटता का प्रतीक है और सरकार व प्रबंधन के लिए सीधी चेतावनी है।
यह प्रदर्शन बिजली निजीकरण और स्मार्ट मीटर के खिलाफ होगा
इधर संयुक्त किसान मोर्चा ने भी आंदोलन को खुला समर्थन देते हुए ऐलान किया है कि 18 मार्च को प्रदेश के सभी जिलों में SDM कार्यालयों पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। मोर्चा के नेता शशिकांत के अनुसार, यह प्रदर्शन बिजली निजीकरण और स्मार्ट मीटर के खिलाफ होगा।संघर्ष समिति ने बिजली कर्मियों से किसानों के इस आंदोलन में शामिल होने की अपील की है, जिससे यह लड़ाई अब व्यापक जनआंदोलन का रूप लेती दिख रही है।
क्या है पूरा मामला?
प्रदेश में पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के निजीकरण के फैसले का लगातार विरोध हो रहा है।
फेडरेशन का आरोप है कि यह फैसला:
जनविरोधी है
सस्ती और भरोसेमंद बिजली व्यवस्था को खतरे में डाल सकता है
पिछले 475 दिनों में बिजली पंचायत, महापंचायत, रैलियों और जनसभाओं के जरिए इस फैसले के खिलाफ लगातार विरोध दर्ज कराया गया है।
दमन के आरोप
संघर्ष समिति और फेडरेशन ने प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं:
बड़े पैमाने पर तबादले
संविदा कर्मियों की छंटनी
बिना नोटिस बर्खास्तगी
अनुशासनात्मक नियमों में कठोर बदलाव
इन्हें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया गया है।
प्रमुख मांगें
पूर्वांचल और दक्षिणांचल डिस्कॉम के निजीकरण का फैसला तुरंत वापस लिया जाए
आंदोलन के दौरान हुई सभी दमनात्मक कार्रवाई खत्म की जाए
19 मार्च 2023 के समझौते को पूरी तरह लागू किया जाए
आर-पार की चेतावनी
फेडरेशन ने साफ कहा है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन और उग्र होगा। जरूरत पड़ने पर देशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी।यह आंदोलन अब सिर्फ कर्मचारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों, उपभोक्ताओं और आम जनता के जुड़ने से एक बड़े जनआंदोलन में बदल चुका है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति और प्रशासन दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
