लखनऊ । उत्तर प्रदेश में तीन साल बाद शुरू होने जा रहे गेहूं और गेहूं से बने उत्पादों के निर्यात पर पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध का असर पड़ने लगा है। समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ने, शिपिंग संकट और बीमा लागत महंगी होने के कारण खाड़ी देशों को होने वाला निर्यात एक बार फिर अनिश्चितता में घिर गया है।

निर्यात में प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 25 से 35 प्रतिशत तक

भारत सरकार ने फरवरी 2026 में सीमित मात्रा में 25 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 5 लाख मीट्रिक टन गेहूं उत्पादों (आटा, मैदा, सूजी) के निर्यात को मंजूरी दी थी। यह कदम 2022 में लगे प्रतिबंध के बाद निर्यात को आंशिक रूप से फिर शुरू करने की दिशा में अहम माना जा रहा था, ताकि किसानों को बेहतर कीमत मिल सके।हालांकि निर्यातक संगठनों का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने और युद्ध जोखिम बीमा के महंगे होने के कारण कई नए निर्यात सौदे फिलहाल टाल दिए गए हैं।इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के महासचिव और यूपी रोलर मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष दीपक बजाज के अनुसार उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्यों में है और गेहूं आधारित उत्पादों के निर्यात में प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 25 से 35 प्रतिशत तक है।

1700 करोड़ रुपये के कारोबार के अवसर बनने की उम्मीद थी

उन्होंने बताया कि निर्यात खुलने से यूपी के लिए करीब 1500 से 1700 करोड़ रुपये के कारोबार के अवसर बनने की उम्मीद थी। इसका लाभ कानपुर, आगरा, अलीगढ़, गाजियाबाद, मेरठ और बरेली समेत लगभग 20 जिलों के मिलिंग और प्रोसेसिंग उद्योग को मिलना था।इन क्षेत्रों की मिलें खाड़ी देशों यूएई, सऊदी अरब, ओमान, कुवैत और कतर में आटा, मैदा और सूजी की आपूर्ति करती रही हैं। लेकिन यदि क्षेत्र में युद्ध की स्थिति लंबी चली तो शिपिंग लागत 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती है और बीमा प्रीमियम भी दोगुना होने की आशंका है।ऐसे में तीन साल बाद खुला निर्यात बाजार फिर से प्रभावित होने का खतरा है, जिससे उत्तर प्रदेश के आटा-मैदा उद्योग और गेहूं व्यापार को बड़ा झटका लग सकता है।

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