लखनऊ । योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में शिक्षामित्रों और अनुदेशकों का मानदेय बढ़ाने की घोषणा की तो प्रदेश भर के 1.43 लाख से अधिक शिक्षामित्र परिवारों में खुशी की लहर दौड़ गई। 2017 में समायोजन निरस्त होने के बाद 35-40 हजार रुपये वेतन से सीधे 10 हजार रुपये मानदेय पर आ गए शिक्षामित्र पिछले लगभग नौ वर्षों से बढ़ोतरी की मांग कर रहे थे। अब सरकार ने उनका “वनवास” खत्म करते हुए 1 अप्रैल से मानदेय लगभग दोगुना करने का फैसला किया है।
कैसे शुरू हुई कहानी?
1999 में सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षामित्र योजना लागू हुई। शुरुआती मानदेय 1450 रुपये था, जो समय-समय पर बढ़ता गया। 2012 में कैबिनेट ने समायोजन का निर्णय लिया और 2014-15 में दो चरणों में बड़ी संख्या में शिक्षामित्रों का समायोजन हुआ। समायोजन के बाद वेतन 35-40 हजार रुपये तक पहुंच गया।लेकिन 2017 में टीईटी पास न होने के आधार पर समायोजन निरस्त हो गया। इसके बाद शिक्षामित्र 10 हजार रुपये मानदेय पर कार्यरत रहे और लगातार आंदोलन करते रहे।
अब क्या बदला?
प्रदेश सरकार ने मानदेय बढ़ाने के साथ ही शिक्षकों की तरह शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को भी 5 लाख रुपये तक की कैशलेस चिकित्सा सुविधा में शामिल किया है। संगठन के पदाधिकारियों—प्रदेश अध्यक्ष शिव कुमार शुक्ला, महामंत्री सुशील यादव और संगठन मंत्री कौशल कुमार सिंह—ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे परिवारों के जीवन स्तर में सुधार होगा और शिक्षण कार्य में मनोयोग बढ़ेगा।
अनुदेशकों को भी राहत
2013-14 में जूनियर हाईस्कूलों में कला, विज्ञान, कंप्यूटर, खेलकूद आदि विषयों के लिए करीब 25 हजार अनुदेशक 7000 रुपये मानदेय पर नियुक्त किए गए थे।
2017 में 1400 रुपये की बढ़ोतरी हुई, बाद में फिर 7000 रुपये कर दिया गया।
नवंबर 2021 में 9000 रुपये किया गया।
अब 9000 से बढ़ाकर 17000 रुपये करने की घोषणा की गई है।
शिक्षामित्र: प्रमुख पड़ाव (टाइमलाइन)
26 मई 1999: योजना लागू, 1450 रुपये मानदेय
2000-01: 2250 रुपये
अक्तूबर 2005: 2400 रुपये
15 जून 2007: 3000 रुपये
11 जुलाई 2011: दो वर्षीय प्रशिक्षण आदेश
23 जुलाई 2012: समायोजन का कैबिनेट निर्णय
2014-15: दो चरणों में 1.3 लाख से अधिक समायोजन
25 जुलाई 2017: सुप्रीम कोर्ट ने समायोजन निरस्त किया
1 अगस्त 2017: मानदेय 10 हजार रुपये
2026: मानदेय लगभग दोगुना करने की घोषणा
