लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र उस वक्त गरमा गया जब पुलिस की कार्यशैली को लेकर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने आ गए। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडे ने सदन में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदेश में पुलिस जनप्रतिनिधियों का फोन तक नहीं उठाती। उन्होंने तल्ख लहजे में कहा, “अध्यक्ष जी, दरोगा दलालों के साथ गप लड़ाते हैं, लेकिन विधायकों का फोन नहीं उठाते। इससे विधायिका के अधिकार कमजोर हो रहे हैं।”
हम विपक्ष में हैं, इसलिए अधिकारी हमारा फोन नहीं उठाते क्या
उनके इस बयान के बाद सदन में कुछ देर के लिए हंगामे की स्थिति बन गई। सपा विधायक कमाल अख्तर ने भी विपक्ष की ओर से स्वर बुलंद करते हुए कहा, “हम विपक्ष में हैं, इसलिए अधिकारी हमारा फोन नहीं उठाते क्या? अगर जनता की समस्या लेकर हम कॉल करें और सुनवाई ही न हो तो फिर लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाता है?”विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के लिए संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना खड़े हुए। उन्होंने कहा कि सरकार जनप्रतिनिधियों की गरिमा के प्रति संवेदनशील है। “मान्यवर, इसी सदन में चार-चार वर्दीधारी पुलिसकर्मियों को दंडित किया गया था। शासनादेश में स्पष्ट निर्देश हैं कि जनप्रतिनिधियों के फोन नंबर फीड किए जाएं, कॉल रिसीव न हो पाए तो अनिवार्य रूप से कॉल बैक किया जाए। यदि ऐसा नहीं होता तो कार्रवाई भी की जाती है,” उन्होंने कहा।
सतीश महाना ने हस्तक्षेप किया और सदन को शांत कराया
मामला बढ़ता देख विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने हस्तक्षेप किया और सदन को शांत कराया। उन्होंने कहा कि यह गंभीर विषय है और जनप्रतिनिधियों की बात सुनी जानी चाहिए।इसी बीच पूर्व आईपीएस अधिकारी और वर्तमान मंत्री असीम अरुण को भी अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया गया। असीम अरुण ने संतुलित रुख अपनाते हुए कहा, “कभी-कभी अधिकारी मीटिंग में, अवकाश पर या अस्वस्थ भी हो सकते हैं, ऐसे में कॉल मिस हो सकता है। लेकिन कॉल बैक करना जिम्मेदारी है। यह भी सच है कि कुछ अधिकारी सुस्त या असंवेदनशील हो सकते हैं।”
प्रदेश और जिला स्तर पर एक ‘अलर्ट नंबर’ बनाया जाए
उन्होंने एक नया सुझाव भी दिया — प्रदेश और जिला स्तर पर एक ‘अलर्ट नंबर’ बनाया जाए। यदि किसी जनप्रतिनिधि का फोन संबंधित अधिकारी नहीं उठाता, तो वह इस नंबर पर सूचना दे सके। वहां से सीधे संबंधित अधिकारी को कॉल जाए, ताकि उसे पता चल सके कि मामला गंभीर है।सदन में चली इस तीखी बहस ने पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही, जनप्रतिनिधियों की गरिमा और शासन-व्यवस्था के तालमेल जैसे बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या ठोस कदम उठाती है और क्या प्रस्तावित ‘खतरे की घंटी’ जैसा तंत्र वास्तव में लागू होता है या नहीं।
